Monday, 18 April 2016

प्रतिदिन स्मरण शुभ मंत्र। जो दे यश कीर्ति धन

prti din smran mantr 

                                                प्रतिदिन स्मरण शुभ  मंत्र- जो दे यश कीर्ति धन 

  प्रात: कर-दर्शनम्
कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
         पृथ्वी क्षमा प्रार्थना
समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥
त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

Tuesday, 12 April 2016

||अथ देव्याः कवचम् || ||devy kavch||

                                                              ||अथ देव्याः कवचम् ||
                                                                       ||devy kavch||

ॐ अस्य श्री चण्डी कवचस्य । ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । चामुण्डादेवता अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम् । दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम् ।। श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।। 
                                                ॐ नमश्चण्डिकायै 
******मार्कण्डेय उवाच *****
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ।। १।। 
*********ब्रह्मोवाच*********
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ।। २।। 
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।। ३।। 
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।। ४।। 
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।। ५।। 
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।। विषमे दुर्गमे चैव भयात्तार्म शरणं गताः ।। ६।। 
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ।। ७।। 
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ।। ८।। 
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।। ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुड़ासना ।। ९।। 
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरि प्रिया ।। १०।। 
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।। ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ।। ११।। 
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोग समन्विताः ।। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नो पशोभिताः ।। १२।। 
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ।। १३।। 
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शाङ्गर्मायुधमुत्तमम् ।। १४।। 
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ।। १५।। 
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।। १६।। 
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवद्धिर्नि ।। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ।। १७।। 
दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋर्त्यां खड्गधारिणी ।। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ।। १८।। 
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।। ऊध्वर्म ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ।। १९।। 
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ।। २०।। 
अजिता वाम पाश्वेर् तु दक्षिणे चापराजिता ।। शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूध्निर् व्यवस्थिता ।। २१।। 
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ।। २२।। 
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोद्वार्रवासिनी ।। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ।। २३।। 
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।। २४।। 
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ।। २५।। 
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला ।। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।। २६।। 
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।। स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।। २७।। 
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।। नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौरक्षेत्कुलेश्वरी ।। २८।। 
स्तनौरक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी ।। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।। २९।। 
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।। ३०।। 
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ।। ३१।। 
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।। पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।। ३२।। 
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोध्वर्केशिनी ।। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ।। ३३।। 
रक्त मज्जा वसा मांसा न्यस्थिमेदांसि पार्वती ।। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ।। ३४।। 
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ।। ३५।। 
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ।। ३६।। 
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ।। ३७।। 
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।। सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ।। ३८।। 
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ।। ३९।। 
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ।। ४०।। 
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा ।। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ।। ४१।। 
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।। ४२।। 
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।। कवचेना वृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ।। ४३।। 
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।। ४४।। 
निर्भयो जायते मत्यर्म: संग्रामेष्वपराजितः ।।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।। ४५।। 
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।। यः
पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।। ४६।। 
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।। जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।। ४७।। 
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।। ४८।। 
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।। भूचराः खेचराश्चैवजलजाश्चोपदेशिकाः ।। ४९।। 
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ।। ५०।। 
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कुष्माण्डा भैरवादयः ।। ५१।। 
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।। ५२।। 
यशसा वद्धर्ते सोऽपि कीर्ति मण्डितभूतले ।। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।। ५३।। 
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्र पौत्रिकी ।। ५४।। 
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादतः ।। ५५।। 
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ।। ॐ ।। 
                                       ||
श्री जगदम्बार्पण मस्तु ||

Monday, 11 April 2016

पितृदोष की शांति हेतु सरल उपाय pitr dosh shanti ke sarl upay


                                         पितृदोष की शांति हेतु सरल उपाय

pitr dosh shanti ke sarl upay 


*घर में कभी-कभी गीता पाठ करवाते रहना चाहिए।
*प्रत्येक अमावस्या को ब्राहमण भोजन अवश्य करवायें।
*ब्राहमण भोजन में पूर्वजों की मनपसंद खाने की वस्तुएं अवश्य बनायी जाए।
*ब्राहमण भोजन में खीर अवश्य बनाए।
*योग्य एवं पवित्र ब्राहमण को श्राद्ध में चांदी के पात्र में भोजन करवायें।
*स्वर्ण दक्षिणा सहित दान करने से अति उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
**पित्रृदोष की शांति करने पर सभी परेशानीयां अपने-आप समाप्त होने लगती है। मानव सफल, सुखी एवं ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।

Sunday, 10 April 2016

नवग्रह पीड़ा शांति के लिए यंत्र एव मन्त्र

नवग्रह पीड़ा  शांति के लिए  यंत्र एव मन्त्र 

navgrh pida shanti hetu 

ज्योतिष में   नवग्रह शांति के लिए आति  सरल मन्त्र है जिसका जाप करने   नवग्रह की पीड़ा से शांति होती है लेकिन यह यंत्र शुभ मुहूर्त में अभिमंत्रित होना चाहिए तो शीघ्र  शुभ फल प्रदान करता है इस यंत्र की पूजा  एवं मन्त्र  जप से किसी भी ग्रह की शांति हो जाती है।एक मंत्र ऐसा भी है जिसके माध्यम से सभी ग्रहों की एक साथ पूजा की जा सकती है। यह मंत्र नौ ग्रहों की पूजा के लिए उपयुक्त है। यदि इस मंत्र का प्रतिदिन जप किया जाए तो सभी ग्रहों का बुरा प्रभाव समाप्त हो जाता है और शुभ फल प्राप्त होते हैं।
Image result for नव ग्रह यंत्र
मंत्र
ऊँ ब्रह्मामुरारि त्रिपुरान्तकारी भानु: राशि भूमि सुतो बुध च।
गुरू च शुक्र: शनि राहु केतव: सर्वेग्रहा: शान्ति करा: भवन्तु।।

पूजित यंत्र उपलब्ध है |

Friday, 1 April 2016

jnmkundli nirmnn जन्मकुंडली निर्माण --जो दे जीवन को दिशा

                                 jnmkundli nirmnn
  जन्मकुंडली निर्माण --जो दे जीवन को दिशा 

जन्मकुंडली जातक के जन्म समय  तारीख और  स्थान के आधार पर बनाई जाती है 
जन्म कुंडली के लाभ --1 बच्चों के बालारिस्ट जन सकते है और कष्ट से बचा सकते है |
2  जातक की शिक्षा  के बारे में जानकारी एव सफलता के योग ,किस विषय में आधिक सफलता होगी |
3   जातक की नोकरी  व्यवसाय किस क्षेत्र   आधिक सफलता प्राप्त होगी | का विवरण होता है |
4   जातक का    विवाह  किस दिशा में विवाह  समय  एव मंगलीक है या नहीं का का विवरण होता है |
5 जातक की कुंडली संतान योग | का विवरण होता है |
6 कुंडली में बने शुभ अशुभ योग  का विवरण होता है |
7  कुंडली में रोग विचार  कष्ट के समय का ज्ञान  निदान | का विवरण होता है |
8  कुंडली में साढ़े साती  का समय आदि की कब साढ़े साती चलती है  का विवरण होता है |
9  आपके लकी रत्न का  का विवरण होता है |
10 और ऐसी अनेक जानकारी जो आपके जीवन को सही मार्गदर्शन दे सफलताओं की ओर ले जावे |
 आप जन्मकुंडली का हस्त लिखित फल प्राप्त करे एवं सभी समस्यायों का निदान प्राप्त करे सम्पर्क करे 
      +917697961597 |

सरल वस्तु टिप्स saral vastu tips

सरल वस्तु टिप्स
saral vastu tips 





धन व कार्य वर्धक यंत्र dhan va karya vardhak yantr

 धन व कार्य वर्धक यंत्र

dhan va karya vardhak yantr


जन्मकुंडली केअनुसार धन एवम कार्यो में सिद्धि देने वाला है |जीवन में 

कोई  न कोई परेशानी  कष्ट धन की हानि कार्यो बाधा परिश्रम करने पर

 भी मन की अभिलाषाओं की पूर्ति नहीं  होती है | तब ------

 धन व कार्य वर्धक यंत्र धारण करने से जीवन में सफलताओं एव धन 

बढने के मार्ग खुलने लगते है |यह धनवर्धक यंत्र जन्मकुंडली के आधार

 पर ही धारण किया जाता है जो धन व  कार्यो को बढाता है यह शुभमुहूर्त 

में निर्मित किये जाते है |