Wednesday, 4 October 2017

आदित्यहृदय स्तोत्र हिन्दी मे नोकरी मे सफलता के लिए


Image result for aditya hrudayam stotram hindiआदित्यहृदय स्तोत्र हिन्दी मे नोकरी मे सफलता के लिए
aditya hrudayam stotram hindi

  • विनियोग
  • ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्येहृदयभूतो
    भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
  • ऋष्यादिन्यास
    ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः हृदि।
    ॐ बीजाय नमः, गुह्यो। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयो। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः नाभौ।
  • करन्यास
    ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः।
    ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवरवते अनामिकाभ्यां नमः।
    ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
  • हृदयादि अंगन्यास
    ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्।
    ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्।
    इस प्रकार न्यास करके निम्नांकित मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए-
    ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
  • आदित्यहृदय स्तोत्र
  • ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
    रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम्।।1।।
    दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
    उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा।।2।।
    उधर श्री रामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।
  • राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
    येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।।3।।
    ‘सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।’
  • आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
    जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्।।4।।
    सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
    चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम्।।5।।
    ‘इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्ष्य और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।’
  • रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
    पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।।6।।
    ‘भगवान सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका (रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम मंत्रों के द्वारा) पूजन करो।’
  • सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
    एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः।।7।।
    ‘सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं।’
  • एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
    महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः।।8।।
    पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
    वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।।9।।
    ‘ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।’
  • आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।
    सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः।।10।।
    हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
    तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्।।11।।
    हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः।
    अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः।।12।।
    व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः।
    घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः।।13।।
    आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
    कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः।।14।।
    नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
    तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते।।15।।
    ‘इन्हीं के नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुर्वणसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक अथवा हरे रंग के घोड़े वाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणों से सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू (कल्याण के उदगमस्थान), त्वष्टा (भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने वाले), अंशुमान (किरण धारण करने वाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से ही सुख देने वाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहरकर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुति के पात्र), अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ (आकाश के स्वामी), तमोभेदी (अन्धकार को नष्ट करने वाले), ऋग, यजुः और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टि के कारण), अपां मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विन्ध्यीथीप्लवंगम (आकाश में तीव्रवेग से चलने वाले), आतपी (घाम उत्पन्न करने वाले), मण्डली (किरणसमूह को धारण करने वाले), मृत्यु (मौत के कारण), पिंगल (भूरे रंग वाले), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोदभव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त) हैं। (इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव !) आपको नमस्कार है।’
  • नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
    ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।16।।
    ‘पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।’
  • जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
    नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।।17।।
    ‘आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है, आपको नमस्कार है।’
  • नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
    नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।18।।
    ‘(परात्पर रूप में) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा हैं, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।’
  • तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
    कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।।20।।
    ‘आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।’
  • तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।
    नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।21।।
    ‘आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरि (अज्ञान का हरण करने वाले) और विश्वकर्मा (संसार की सृष्टि करने वाले) हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।’
  • नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।
    पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।।22।।
    ‘रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं।’
  • एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
    एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्।।23।।
    ‘ये सब भूतों में अन्तर्यामीरूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।’
  • देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
    यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः।।24।।
    ‘(यज्ञ में भाग ग्रहण करने वाले) देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।’
  • एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
    कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव।।25।।
    ‘राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।’
  • पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
    एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति।।26।।
    ‘इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।’
  • अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
    एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्।।27।।
    ‘महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे।’ यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये।
  • एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।
    धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्।।28।।
    आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।
    त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्।।29।।
    रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।
    सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्।।30।।
    उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजी ने धनुष उठाकर रावण की ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया।
  • अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
    निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।।31।।
    उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखा और निशाचराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’।

    इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पंचाधिकशततमः सर्गः।

Monday, 2 October 2017

करवा चौथ का व्रत विधि और मुहूर्त 8 - अक्टूबर -2017

                  करवा चौथ का   व्रत विधि और      मुहूर्त  8 - अक्टूबर -2017


Karwa chauthकरवा चौथ व्रत सुहागिनों का महत्वपूर्ण त्यौहार माना गया है। करवा चौथ व्रत कार्तिक मास के चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को आमतौर महिलाओं द्वारा किया जाता है। महिलाएं करवा चौथ व्रत पति की दीर्घायु की कामना के लिए करती है। कारवां चौथ व्रत की विधि है:- 
व्रत के दिन सुबह स्नान करने के बाद इस संकल्प को करें- 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।'
पूरे दिन बिना पानी के सेवन के साथ रहना चाहिए। इस साल करवा चौथ का व्रत 8 अक्टूबर (रविवार) को है। 
  • करवा चौथ शुभ मुहूर्त-
  • तारीख-8 अक्टूबर, दिन- रविवार, करवा चौथ पूजा मुहूर्त- 17:55 से 19:09 
  • चंद्रोदय- 20:14 
  • चतुर्थी तिथि आरंभ- 16:58 (8 अक्टूबर ) 
  • चतुर्थी तिथि समाप्त- 14:16 (9 अक्टूबर)

  1. घर के दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्र बनाएं। इसे वर कहा जाता है। चित्र बनाने की कला को करवा धरना कहा जाता है।
  2. आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ और पक्के पकवान बनाएं।
  3. पीली मिट्टी से गौरी बनाएं साथ ही गणेश को बनाकर गौरी के गोद में बिठाएं।
  4. गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएं। चौक बनाकर आसन को उस पर रखें। गौरी को चुनरी ओढ़ाएं। बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें।
  5. जल से भरा हुआ लोटा रखें।
  6. भेंट देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। करवा में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें।
  7. रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं।
  8. गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें।
  9. 'नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥'
  10. करवा पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें।
  11. कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें।
  12. तेरह दाने गेहूं के और पानी का लोटा या टोंटीदार करवा अलग रख लें।
  13. रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें।
  14. इसके बाद पति से आशीर्वाद लें। उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें।

Sunday, 1 October 2017

शरद पूर्णिमा व्रत कथा-----चंद्रमा अपनी किरणों से धरती पर अमृत गिराता है।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा-----चंद्रमा अपनी किरणों से धरती पर अमृत गिराता है। 


shrad purnima vrt katha


Image result for शरद पूर्णिमाहिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। साल 2017 में शरद पूर्णिमा 05 अक्टूबर को मनाई जाएगी। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते है। शरद पूर्णिमा हिन्दू पंचांग के आश्विन महीने में पूरे चाँद के दिन मनाया जाता है। शरद पूर्णिमा को कौमुदी त्यौहार के तौर पर भी मनाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्यूंकि यह मान्यता है की इस दिन चंद्रमा अपनी किरणों से धरती पर अमृत गिराता है। 
शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा कहने के पीछे भी एक कथा है। ऐसी मान्यता है की शरद पूर्णिमा के दिन देवी लक्ष्मी रात में आसमान में घुमते हुआ यह पूछती है की ‘कौ जाग्रति’। असल में देवी लक्ष्मी उन लोगों को ढूँढती है जो रात में जाग रहे होते है। संस्कृत में ‘कौ जाग्रति’ का मतलब होता है की ‘कौन जाग रहा है’। जो लोग शरद पूर्णिमा के दिन रात में जाग रहे होते हैं उन्हें देवी लक्ष्मी धन प्रदान करती है।   अनुसार शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा को आती हैं। ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। शरद पूर्णिमा को कौमुदी व्रत, कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से जानते हैं। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महारास रचा था। कहते हैं शरद पूर्णिमा की रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखने का विधान है।
कथा
एक साहुकार के दो पुत्रियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थी। बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। हुआ यह कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा को पूरे विधि-विधान से पूजा करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने शरद पूर्णिमा का व्रत किया। तब छोटी पुत्री के यहां संतान पैदा हुई, लेकिन वह भी शीघ्र ही मर गई । उसने अपनी संतान के लिटाकर ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। फिर बड़ी बहन को बुलाकर लाई और उसी जगह पर बैठने को कहा, जहां उसने अपनी संतान को उसने कपड़े से ढंका था। बड़ी बहन जब बैठने लगी, तो उसका घाघरा बच्चे का छू गया और घाघरा छूते ही बच्‍चा रोने लगा।
बडी बहन बोली- 'तुम मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।' तब छोटी बहन बोली, 'यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। इस घटना के बाद से वह हर वर्ष शरद पूर्णिमा का पूरा व्रत करने लगी।'
शरद पूर्णिमा व्रत विधि 
- पूर्णिमा के दिन सुबह में इष्ट देव का पूजन करना चाहिए.
- इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी के दीपक जलाकर उसकी गन्ध पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए.
- ब्राह्माणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए.
- लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रुप से किया जाता है. इस दिन जागरण करने वालों की धन-संपत्ति में वृद्धि होती है.
- रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए. 
- मंदिर में खीर आदि दान   दी  है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन चांद की चांदनी से अमृत बरसता है.

Saturday, 30 September 2017

श्री सूक्तं का पाठ हिन्दी व संस्कृत मे अतुल लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु

श्री सूक्तं का पाठ हिन्दी व  संस्कृत मे अतुल लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु 

shree sukt hindi va sanskrit me  atul laxmi hatu 



श्री सूक्त में पंद्रह मन्त्र है  इसके पाठ से अतुल लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और श्री यंत्र के साथ पूजा करने से धन वर्षा होती है 
                                                          श्री सूक्तं अर्थ सहित
Image result for लक्ष्मी           ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
           चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह। (१)
हे जातवेदा अग्निदेव आप मुझे सुवर्ण के समान पीतवर्ण वाली तथा किंचित हरितवर्ण वाली तथा हरिणी रूपधारिणी सुवर्नमिश्रित रजत की माला धारण करने वाली , चाँदी के समान धवल पुष्पों की माला धारण करने वाली , चंद्रमा के सद्रश प्रकाशमान तथा चंद्रमा की तरह संसार को प्रसन्न करने वाली या चंचला के सामान रूपवाली ये हिरण्मय ही जिसका सरीर है ऐसे गुणों से युक्त लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाओ। 
         ॐ तां म आ व ह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्
            यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं परुषानहम।। (२)
हे जातवेदा अग्निदेव आप उन जगत प्रसिद्ध लक्ष्मी जी को मेरे लिए बुलाओ जिनके आवाहन करने पर मै सुवर्ण,गौ, अश्व और पुत्र पोत्रदि को प्राप्त करूँ। 
             ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद्प्रमोदिनिम। 
                 श्रियं देविमुप हवये श्रीर्मा देवी जुस्ताम।। (३) 

जिस देवी के आगे और मध्य में रथ है अथवा जिसके सम्मुख घोड़े रथ से जुते हुए हैं ,ऐसे रथ में बैठी हुई ,हथियो की निनाद स संसार को प्रफुल्लित करने वाली देदीप्यमान एवं समस्त जनों को आश्रय देने वाली लक्ष्मी को मैं अपने सम्मुख बुलाता हूँ। दीप्यमान तथा सबकी आश्रयदाता वह लक्ष्मी मेरे घर मई सर्वदा निवास करे
       ॐ कां सोस्मितां हिरण्य्प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। 
                    पद्मेस्थितां पदमवर्णां तामिहोप हवये श्रियम्।। (४)
जिसका स्वरूप वाणी और मन का विषय न होने के कारण अवर्णनीय है तथा जो मंद हास्यायुक्ता है, जो चारों ओर सुवर्ण से ओत प्रोत है एवं दया से आद्र ह्रदय वाली देदीप्यमान हैं। स्वयं पूर्णकाम होने के कारण भक्तो के नाना प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाली। कमल के ऊपर विराजमान ,कमल के सद्रश गृह मैं निवास करने वाली संसार प्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने पास बुलाता हूँ।

        ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्ती श्रियं लोके देवजुस्टामुदराम्।
            तां पद्मिनीमी शरणं प्रपधे अलक्ष्मीर्मे नश्यतां तवां वृणे।।(५)
चंद्रमा के समान प्रकाश वाली प्रकृत कान्तिवाली , अपनी कीर्ति से देदीप्यमान , स्वर्ग लोक में इन्द्रादि देवों से पूजित अत्यंत दानशीला ,कमल के मध्य रहने वाली ,सभी की रक्षा करने वाली एवं अश्रयदाती ,जगद्विख्यात उन लक्ष्मी को मैं प्राप्त करता हूँ। अतः मैं तुम्हारा आश्रय लेता हूँ ।

        ॐ आदित्यवर्णे तप्सोअधि जातो वनस्पतिस्तव व्रक्षोथ बिल्वः।
          तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्य अलक्ष्मीः।।(६)
हे सूर्य के समान कांति वाली देवी अप्पके तेजोमय प्रकाश से बिना पुष्प के फल देने वाला एक वृक्ष विशेष उत्पन्न हुआ। तदन्तर अप्पके हाथ से बिल्व का वृक्ष उत्पन्न हुआ। उस बिल्व वृक्ष का फल मेरे बाह्य और आभ्यन्तर की दरिद्रता को नष्ट करें।।

                 उपैतु मां देवसखः किर्तिक्ष्च मणिना सह।
               प्रदुभुर्तॉस्मि रास्ट्रेअस्मिन् कीर्तिंमृद्विमं ददातु मे।(७)

हे लक्ष्मी ! देवसखा अर्थात श्री महादेव के सखा (मित्र ) इन्द्र ,कुबेरादि देवतओं की अग्नि मुझे प्राप्त हो अर्थात मैं अग्निदेव की उपासना करूँ। एवं मणि के साथ अर्थात चिंतामणि के साथ या कुबेर के मित्र मणिभद्र के साथ या रत्नों के साथ ,कीर्ति कुबेर की कोशशाला या यश मुझे प्राप्त हो अर्थात धन और यश दोनों ही मुझे प्राप्त हों। मैं इस संसार में उत्पन्न हुआ हूँ , अतः हे लक्ष्मी आप यश और एश्वर्या मुझे प्रदान करें।
                   क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठमलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
                  अभूतिमसमृद्धि च सर्वां निर्गुद में गृहात्।।(८)
भूख एवं प्यास रूप मल को धारण करने वाली एवं लक्ष्मी की ज्येष्ठ भगिनी दरिद्रता का मैं नाश करता हूँ अर्थात दूर करता हूँ। हे लक्ष्मी  आप मेरे घर में अनैश्वर्य तथा धन वृद्धि के प्रतिब धकविघ्नों को दूर करें।
                 गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यापुष्टां करीषिणीम्।
                 ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप हवये श्रियम्।।(९)
सुगन्धित पुष्प के समर्पण करने से प्राप्त करने योग्य,किसी से भी न दबने योग्य। धन धान्य से सर्वदा पूर्ण कर गोउ ,अश्वादि पशुओं की समृद्धि देने वाली , समस्त प्राणियों की स्वामिनी तथा संसार प्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने घर परिवार मैं सादर बुलाता हूँ।।

                  मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
                 पशुनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः।।(१०)

हे लक्ष्मी ! मैं आपके प्रभाव से मानसिक इच्छा एवं संकल्प। वाणी की सत्यता,गोउ आदि पशुओ के रूप (अर्थात दुग्ध -दधिआदि एवं याव्ब्रिहादी) एवं अन्नों के रूप (अर्थात भक्ष्य ,भोज्य। चोष्य,चतुर्विध भोज्य पदार्थ ) इन सभी पदार्थो को प्राप्त करूँ। सम्पति और यश मुझमे आश्रय ले अर्थात मैं लक्ष्मीवान एवं कीर्तिमान बनूँ।।

                       कर्दमेन प्रजा भूता मयि संभव कर्दम।
                      श्रियम वास्य मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।।(११)

"कर्दम "नामक ऋषि -पुत्र से लक्ष्मी प्रक्रस्ट पुत्रवाली हुई है। हे कर्दम !तुम मुझमें अच्छी प्रकार से निवास करो अर्थात कर्दम ऋषि की कृपा होने पर लक्ष्मी को मेरे यहाँ रहना ही होगा। हे कर्दम ! मेरे घर में लक्ष्मी निवास करें ,केवल अतनी ही प्रार्थना नहीं है अपितु कमल की माला धारण करने वाली संपूर्ण संसार की मत लक्ष्मी को मेरे घर में  निवास कराओ।।
               आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् मे गृहे।
              नि च देवीं मातरं श्रियं वास्य मे कुले।।(12)

जिस प्रकार कर्दम ली संतति 'ख्याति 'से  लक्ष्मी अवतरित हुई उसी प्रकार कल्पान्तर में भी समुन्द्र मंथन द्वारा चौदह रत्नों के साथ लक्ष्मी का भी आविर्भाव हुआ है। इसी अभिप्राय से कहा जा सकता है कि वरुण देवता स्निग्ध अर्थात मनोहर पदार्थो को उत्पन्न करें। (पदार्थो कि सुंदरता ही लक्ष्मी है। लक्ष्मी  के आनंद, कर्दम,चिक्लीत और श्रित -ये चार पुत्र हैं। इनमे 'चिक्लीत ' से प्रार्थना की गई है कि हे चिक्लीत नामक  लक्ष्मी  पुत्र ! तुम मेरे गृह में निवास करो। केवल तुम ही नहीं ,अपितु दिव्यगुण युक्त सर्वाश्रयभूता अपनी माता लक्ष्मी को भी मेरे घर में निवास कराओ।
             आद्रॉ  पुष्करिणीं  पुष्टिं पिंडग्लां पदमालिनीम्।
            चन्द्रां  हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह।। (13)
हे अग्निदेव ! तुम मेरे घर में पुष्करिणी अर्थात दिग्गजों (हाथियों ) के सूंडग्रा से अभिषिच्यमाना (आद्र शारीर वाली ) पुष्टि को देने वाली अथवा पुष्टिरूपा रक्त और पीतवर्णवाली ,कमल कि माला धारण करने वाली ,संसार को प्रकाशित करने वाली प्रकाश स्वरुप लक्ष्मी को बुलाओ।।
                 आद्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
               सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह।। (१४)
हे अग्निदेव !तुम मेरे घर में भक्तों पर सदा दयद्रर्चित अथवा समस्त भुवन जिसकी याचना करते हैं,दुस्टों को दंड देने वाली अथवा यष्टिवत् अवलंबनीया (सारांश  यह हें कि , 'जिस प्रकार लकड़ी के बिना असमर्थ पुरुष चल नहीं सकता,उसी प्रकार लक्ष्मी के बिना संसार का कोई भी कार्य नहीं चल सकता ), सुन्दर वर्ण वाली एवं सुवर्ण कि माला वाली सूर्यरूपा  (अर्थात जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश और वृष्टि द्वारा जगत का पालन -पोषण करता है उसी प्रकार लक्ष्मी ,ज्ञान और धन के द्वारा संसार का पालन -पोषण करती है)अतः प्रकाश स्वरूपा लक्ष्मी को बुलाओ।

               तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम् ।
     यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योअश्र्वान् विन्देयं पुरुषानहम्।। (१५)
हे अग्निदेव ! तुम मेरे यहाँ उन जगद्विख्यात लक्ष्मी को जो मुझे छोड़कर अन्यत्र न जेन वाली हों ,उन्हें बुलाओ। जिन लक्ष्मी के द्वारा मैं सुवर्ण , उत्तम ऐश्वर्य ,गौ ,दासी ,घोड़े और पुत्र -पौत्रादि को प्राप्त करूँ अर्थात स्थिर लक्ष्मी को प्राप्त करूँ।

                यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
               सूक्तं पञ्चदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत्।। (१६)


जो मनुष्य लक्ष्मी कि कामना करता हो ,वह पवित्र और सावधान होकर प्रतिदिन अग्नि में गौघृत  का हवन और साथ ही श्रीसूक्त कि पंद्रह ऋचाओं का प्रतिदिन पाठ करें।