Wednesday, 27 March 2013
funny time
Sunday, 24 March 2013
gita rahasya in hindi
श्रीमद् भगवद् गीता रहस्य
gita rahasya in hindi
कविता अनुवाद
अश्विनी कपूर
gita rahasya in hindi
श्रीमद् भगवद् गीता रहस्य
श्री भगवान बोले अर्जुन से
'गुणवानों के गुणों को देखो,
गुण में दोष कभी न ढूँढो,
मिथ्या आरोपण न करो,
दोष रहित भक्त बनो तुम
इस उपदेश का अधिकारी वही
ईश्वर की सत्ता में श्रद्धा हो जिसकी |'
'समस्त दु:खों से,
दु:खमयी कर्मो से,
दुर्गुणों से
जन्म-मरण के सांसारिक बन्धन से,
इस बन्धन के अज्ञात से
वही छूट पाता,
जो ज्ञान से, विज्ञान से
इस ज्ञान योग की महिमा समझे,
वह पाप रहित हो जाता |
गोपनीय योग से परिचित होकर,
मोहमाया से मुक्त हो जाता |
वह बन्धन से मुक्ति पा जाता |'
'गुणवानों के गुणों को देखो,
गुण में दोष कभी न ढूँढो,
मिथ्या आरोपण न करो,
दोष रहित भक्त बनो तुम
इस उपदेश का अधिकारी वही
ईश्वर की सत्ता में श्रद्धा हो जिसकी |'
'समस्त दु:खों से,
दु:खमयी कर्मो से,
दुर्गुणों से
जन्म-मरण के सांसारिक बन्धन से,
इस बन्धन के अज्ञात से
वही छूट पाता,
जो ज्ञान से, विज्ञान से
इस ज्ञान योग की महिमा समझे,
वह पाप रहित हो जाता |
गोपनीय योग से परिचित होकर,
मोहमाया से मुक्त हो जाता |
वह बन्धन से मुक्ति पा जाता |'
'परम गोपनीय ज्ञान यह,
ज्ञात-अज्ञात सब विद्याओं का ज्ञाता |
परिपूर्ण है विज्ञान से,
अति पवित्र, अति उत्तम,
प्रत्यक्ष फल देने वाला,
प्रत्यक्ष दर्शन ईश्वर का दे जो,
यह धर्म युक्त,
समझो तो अति सुगम |
यह परम अविनाशी |'
'हे परन्तप!
श्रद्धा से यह ज्ञान समझ सकते,
श्रद्धा रहित
यह भाव समझ न पाता |
संशयों से वह घिरा रहता |
राह भटक,
संसार चक्र में वह भटकता |
बार-बार जन्म लेता,
आकर फिर लौट जाता |
भोगों में ही रत रहता,
योग कभी न जान पाता |
ज्ञान भी, विज्ञान भी,
समझ से उसकी परे रहता |
ईश्वर को वह जान न पाता |
ईश्वर को वह पा न पाता |'
'आकाश से जैसे
वायु-जल-तेज-पृथ्वी,
सुवर्ण से गहने,
मिट्टी से बर्तन व्याप्त रहते,
वैसे ही यह विश्व सारा
सगुण-निराकार परमात्मा में व्याप्त सदा |
सब प्राणी जन
मेरे संकल्प में आधार स्थित |
यदि देखो तो वास्तव में
मैं उनमें स्थित नहीं कहीं |
असाधारण योग शक्ति को मेरी देखो
समस्त जगत मुझमें स्थित है
और मैं फिर भी स्थित नहीं कहीं
कारण भी मैं हूँ तुम्हारा,
आधार भी मैं हूँ तुम्हारा |
सर्वव्यापकता
को मेरी समझ,
मैं तुझमें होकर
भी
तुम्हारी स्थिति
से विरक्त हूँ |'
'निर्लिप्त भाव से
इस प्रकृति की
मैंने रचना कर दी |
इस भाव से मैं
विरक्त हूँ |
तुम मानो तुम्हारे साथ हूँ,
तुम मानो तुम्हारे ज्ञान हूँ |
पर मैं होकर भी
तुममें स्थित नहीं हूँ|'
बादलों का
आधार आकाश है जैसे
पर बादल उसमें सदा नहीं रहते |
अनित्य हैं, स्थिर सत्ता नहीं उनकी |
ऐसे में आकाश सदा रहता,
और बादल हैं या नहीं कहीं,
आकाश सदा व्याप्त रहता |
उसकी स्थिरता बनी रहती |
'सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड
मेरी योग शक्ति से निर्मित,
प्राणी का आधार वही |
जगत है, मुझसे है |
प्राणी है, मुझसे है |
मैं प्राणी-मात्र से स्थित नहीं |'
'मेरी योग शक्ति को देखो |
प्राणी को धारण करने वाला,
प्राणी का पोषण करने वाला
प्राणी को उत्पन्न करने वाला
निर्लिप्त भाव से कैसे
अपनी स्थिति में स्थित होकर
प्राणी मात्र में स्थित नहीं ||
आकाश से उत्पन्न होकर
वायु सर्वत्र विचरती,
आकाश में सदा स्थित रहती |
मेरे संकल्पों से उत्पन्न प्राणी,
सर्वत्र-सदा मुझमें स्थित रहता |
तब भी इस प्राणी मात्र के
मोह भाव से मैं मुक्त रहता |
इस प्राणी मात्र के विकारों का
सर्वथा मुझमें अभाव रहता |'
'हे अर्जुन!
ब्रह्म की आयु जब पूर्ण होती,
कल्पों का जब क्षय हो जाता,
महाप्रलय के उस काल में,
सब प्रकृति जनित प्राणी
नष्ट हो जाते |
सब मेरी प्रकृति में लीन हो जाते |
कल्प रात्रि के बीत जाने पर,
मैं नई प्रकृति का निर्माण करता |
मैं नए रुप फिर स्थापित करता
फिर से एक नई सुबह होती |
अपनी प्रकृति में नए रुप रचता |
अपने गुण-कर्म-स्वभाव के
बन्धन से जो जकड़ा रहता,
वह नए कल्प में
अपने स्वभाव के अनुरुप जन्म लेता |
वह फिर से
इस सृष्टि के आदि रुप में जन्म लेता |
जब तक मेरी
इस प्रकृति के वश में
प्राणी रहता,
तब तक उसका जन्म होता |
वह हर नई सुबह
हर नयी शाम को
एक नया रूप धरता |
मेरे स्वरूप को जो जान लेता |
मेरी शरण में जो आ जाता,
वह मुझे ही प्राप्त हो जाता,
वह मेरे रूप में ही
समा जाता |'
'हे अर्जुन!
मैं अपनी
सृष्टि-संरचना की
कर्म लीला से
आसक्ति नहीं करता |
प्रकृति रचित जो जैसा
कर्म करता,
जिसके जैसे गुण हो जाते
मैं निर्लिप्त भाव से
उनके कर्मो से उदासीन रहता |
जैसे प्रकृति को रच कर,
उस प्रकृति के हर प्राणी में
बसकर भी,
मैं आसक्त नहीं होता,
कर्म करके भी
कर्म बन्धन में नही बँधता |
मुझे कर्मो के फलस्वरुप
हर्ष-शोक-सुख-दु:ख का
भाव नहीं होता,
वैसे ही प्राणी यदि
ऐसा भाव स्थापित करे
तो वह कर्म बन्धन से मुक्त हो सकता |
मेरी तरह प्रकृति का होकर भी,
कर्मो को निभाकर भी,
मेरे रुप में समा सकता |'
'हे अर्जुन!
मेरी अध्यक्षता में
प्रकृति अपना कर्तव्य निभाती |
मैने प्रकृति को सत्ता-स्फूर्ति प्रदान कीं,
समस्त जगत की उत्पत्ति-स्थिति और
संहार की क्रियाएँ प्रदान कीं |
यह चक्र सदा चलता रहा है,
और सदा चलता रहेगा |'
'मेरी सर्वव्यापकता को न समझ,
मूढ लोग मुझे तुच्छ समझते |
मेरी प्रकृति को मुझसे अलग मानते |
मैं मनुष्य रुप में आया,
लोकहित हेतु |'
'यह लीला रची मैंने
धर्म स्थापना हेतु |
मेरी अवज्ञा करते
अज्ञानता से,
मुझे साधारण पुरुष मानते
अपने अहँ में डूबे |
ऐसे अहँकारी जन,
व्यर्थतम आशाओं में डूबे,
व्यर्थ कर्मो में रत,
विक्षिप्त चित्त, अज्ञान भाव से
अन्धकारमयी स्वरुप दे
स्वयं को ज्ञानी समझते |'
'राक्षसी भाव लिए,
द्वेष भाव से दूसरों का
अनिष्ट करते,
दूसरों को दु:ख पहुँचाते |
काम-लोभ के वश में होकर,
आसुरी प्रकृति में लिप्त हुए,
दूसरों से क्लेश रखते,
उनके स्वत्व हरण में लगे रहते |'
'मोह के वशीभूत होकर,
प्रमाद से प्रेरित हुए
मोहिनी प्रकृति युक्त पुरुष,
अपनी इच्छा पूर्ति मं
दूसरों को दु:ख पहुँचाते|
वे आसुर स्वभाव पर
आश्रित होते |
प्रकृति के स्वरुप से
उलट भाव में स्थित रहते |'
'परन्तु हे कुन्तीपुत्र!
जो दैवी प्रकृति पर आश्रित होता,
वह प्रकृति के स्वरुप को समझता |
वह प्रकृति के अनुरुप चलता |
वह विलक्षण जन मुझे
सब प्राणियों का सनातन कारण जानता |
वह मुझे नाशरहित, अक्षर-ब्रह्म जानकर
अनन्य मन से मुक्त होकर,
मेरे ज्ञान-रस में डूबा,
मेरे कर्म-ज्ञान को जान कर,
मुझमें निरन्तर स्थापित रहता |
मुझको निरन्तर स्मरण करता |'
वह दृढ-निश्चयी होता |
मेरे नाम-गुण का ज्ञान रखता,
उसे सदा स्मरण करता |
मुझे पाने का यत्न करता |
कर्म करता,
लोकहित का चिन्तन करता,
मेरे ध्यान में चित्त लगाता,
मेरी राह पाने को आतुर रहता,
अनन्य भाव से मेरी उपासना करता |'
'ज्ञान योगी
ज्ञान यज्ञ से
अभिन्न भाव से,
निर्गुण-निराकार ब्रह्म की
उपासना करते |
ज्ञानयोगी
कर्तापन के अभिमान से रहित रहकर,
शरीर-इन्द्रिय और मन द्वारा
होने वाले समस्त कर्मो में,
गुणों को गुण ही बरतते,
सम्पूर्ण दृश्यवर्ग को मृगतृष्णा के जल सदृश
समझते |
एक निर्गुण-निराकार परब्रह्म
की सत्ता ही स्वीकारते |
उसी का श्रवण-मनन-चिन्तन करते,
अभिन्न भाव से उसी में स्थित रहते |'
'ज्ञानी जन ऐसे भी होते,
जो सम्पूर्ण विश्व को
ईश्वर से उत्पन्न हुआ मान,
उसी में सभी कुछ व्याप्त है मानते |
विश्वरुप में स्थित मान ईश्वर को,
सूर्य-चन्द्र-अग्नि-इन्द्र-वरुण
एवं सभी प्राणियों को
ईश्वर का स्वरुप मानते |
कर्मो के प्रतिपादन से वे
यथायोग्य निष्काम भाव से पूजा करते |
जो जैसे रुप में
मेरा रुप देखता,
जो जैसा मेरा
स्वरुप समझता
वैसा ही वह मुझको पूजता |'
'सब यज्ञों का आदि भी मैं हूँ,
सब यज्ञों का अन्त भी मैं हूँ |
क्रतु, यज्ञ और स्वधा भी मैं हूँ |
औषधि-घृत और मन्त्र भी मैं हूँ |
अग्नि भी मैं हूँ,
और यज्ञ की सभी क्रियाएँ
मुझसे ही सम्पूर्ण होतीं |
मेरे रुप अनेक,
मैं हर नए भाव में दिखता |
जो जैसा कुछ देखता,
मेरा भाव उसे वैसा ही मिलता |'
'मै कण-कण में हूँ विराजमान,
मेरा रुप रचे नित नए विधान |
सम्पूर्ण जगत है धारण मुझमें |
कर्मो का फल निर्धारित
करना मेरे विधान में आता |
माता-पिता-पितामह के रुप में
मैं सर्वत्र दृष्टिगत होत |'
'जो प्राणी मात्र को विशुद्ध कर दे
वह ओंकार भी मैं हूँ |
ज्ञान का भण्डार रचा जो
वह ऋगवेद, सामवेद और
यजुर्वेद भी मैं हूँ |
सब मेरे की स्वरुप है,
सभी ईश्वर के विभिन्न रुप है |'
'जिसे परम धाम तू कहता,
वह परम धाम है मेरा रुप |
सम्पूर्ण जगत का रक्षण करने वाला,
सबका पालनहार भी मैं हूँ |
समस्त कर्मो का
शुभ-अशुभ भी मैं हूँ |
सब का एक निवास है मुझमें |'
'प्रत्युपकार न चाहकर
उपकार ही करता |
सब का हित हूँ चाहने वाला |
उत्पत्ति-प्रलय का
हेतु सबकी |
सबका आधार-निधान,
और
अविनाशी कारण भी
मैं हूँ |'
'मैं सूर्य से तपता हूँ,
वर्षा का आकर्षण करता हूँ,
उसे धरा पर बरसाता हूँ |
हे अर्जुन!
मैं ही अमृत और मृत्यु भी मैं हूँ |
मैं ही सत्
और असत् भी मैं हूँ |'
'तीनों वेदों के विधान से
चलकर
साकाम कर्म जो करते,
कर्म काण्ड से श्रद्धा व प्रेम करते |
मेरी सर्वरुपता से अनभिज्ञ होकर,
सोमरस का पान जो करते,
पाप रहित होकर,
स्वर्ग प्राप्ति की चाह लिए,
वे मेरी उपासना करते|
वे पुण्य करते, पाप नहीं करते,
बस कामनाओं का अभाव नहीं होता |
वे स्वर्ग लोक को जाते,
देवताओं का सानिध्य पाते,
अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर पाते |
अपने पुण्यों के बल पर
स्वर्ग लोक में आनन्द उठाते |
पुण्यों का हिसाब पूरा कर
लौट धरा पर वापिस आते |'
'एक नया अध्याय
फिर से आरम्भ हो जाता |
वेदों में कहे
साकाम कर्म भाव से,
साधन तो कर लेते साधक,
स्वर्ग को पाने का |
पर भूले रहते
जीवन के मूल तत्व को |
बार-बार का
यह आना-जाना
कभी नहीं रुक पाता |
पुण्य का प्रभाव
स्वर्ग ले जाता,
क्षीण हुआ तो
मानव लौट धरती पर आता |'
'यह चक्र सदा चलता
रहता |
जो अनन्य भक्त
ईश्वर का चिन्तन करते |
निष्काम भाव से
ईश्वर को भजते,
पाप-पुण्य का,
इच्छा-आसक्ति का
अभाव करते,
वे नित्य-निरन्तर
चलते-चलते,
कर्म की राह पर आगे बढ़ते,
मेरे परम धाम में आ जाते |
मुझे स्वयं प्राप्त हो जाते |
सब बन्धन क्षण भर में
छूट जाते |'
'हे अर्जुन!
कामना-सिद्धि को
जो पूजा करता देवताओं की,
वह विधि पूर्वक तभी कहलाती
जब साकाम भक्त
देवता को ईश्वर का ही एक रुप मानता |'
'जो इस तत्व को न समझकर,
देवताओं को ईश्वर से भिन्न मानता,
उसका पूजन अज्ञान युक्त,
अविधि युक्त कहलाता |'
'युक्त विश्व विराट,
विराट रुप ईश्वर का |
प्राणी-देवता-सबका
नियन्ता ईश्वर |
जो इस तत्व को जाने नहीं,
वह ईशवर को न पा पाता |
वह पुनर्जन्म को प्राप्त होता |
वह लौट धरा पर फिर से आता |'
'देवताओं को पूजकर,
देवताओं को पाते |
पितरों को पूजकर,
पितरों को पाते |
देव-पितरों की पूजा
साकाम भाव से युक्त ही होती |
अपना फल देकर नष्ट हो जाती |'
'देवताओं को पूजो,
पितरों को पूजो,
ईश्वर के भाव मान कर पूजो,
निष्काम भाव से पूजो
तभी सहज ईश्वर पाओगे |'
'भूतों को पूजकर,
भूतों को ही पाते |
वे तामसी भाव के पूजक होते,
अनिष्ट फल किसी और का चाहते |
वे मेरी भक्ति की परिधि में नहीं आते |'
मेरी पूजा निष्काम भाव से,
उपसना करो आसक्ति त्याग के,
पुनर्जन्म नहीं, मुझसे मिलन हो जाएगा |
मेरा भक्त निश्चय ही मुझे पाएगा |'
'वर्ण-आश्रम-जाति का भेद नहीं |
भक्त की कोई और श्रेणी नहीं होती |
भक्त बस भक्त ही कहलाता |
बल-रुप-धन-आयु-जाति
गुण-विद्या का भेद नहीं होता |
भक्ति में विश्वास प्रबल होता |
भक्ति में भाव प्रबल होता |'
'प्रेम भाव से
पत्र-पुष्प-फल-जल,
शुद्ध बुद्धि, निष्काम भाव से
जो कुछ भी प्रेम भाव से
मुझको अर्पित कर देता,
मैं प्रेम भाव से ग्रहण करता |
मैं नित नए सगुण रुप धर कर
प्रीति सहित ग्रहण कर लेता |'
'हे अर्जुन!
अर्पण कर अपने कर्म को,
अर्पण कर अपने अन्न को,
अर्पण कर यज्ञ-दान-तप को,
सब अर्पण कर ईश्वर को |'
'समस्त कर्म जो
अर्पण कर दे,
ईश्वर भाव में स्थित हो जाए |
सन्यास भाव मन में
आ जाए,
दृढ-निश्चय के साथ
स्वयं शुभाशुभ कर्मो
से मुक्त हो जाए |
अभाव हो जाए
कर्मफल का,
उसी अभाव में वह ईश्वर
पा जाए |
वह मुक्त हो जाए,
वह ईश्वर को पा जाए |'
'मैं सब प्राणियों में
समभाव रखता,
नहीं किसी से राग-द्वेष,
प्रिय-अप्रिय का भाव नहीं है |
जो मुझे स्मरण करता,
मैं भी उसको स्मरण रखता हूँ |
प्रेम भाव से जो चाह मेरी करता,
मैं प्रेम भाव से उसे मिलता हूँ |
जो मुझमें निष्ठा स्थापित रखते,
मैं उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देता हूँ |'
'अतिशय दुराचारी मेरा स्मरण यदि करता,
शुभ संस्कार यदि जागृत हो उठता,
पापों से आसक्ति त्याग,
मुझे स्मरण करने लगता,
वह साधु भाव को प्राप्त होता |
उसके दृढ-निश्चय को मैं नतमस्तक |'
'मेरे भाव को जिसने जान लिया,
उसे स्वयं आसक्ति से
विरक्ति मिल जाती |
मन द्वेष भाव से मुक्त हो जाता |
वह धर्मात्मा हो जाता,
वह परम शाँति को पा लेता |'
'वह मेरा साधन
अपना लेता,
वह नष्ट नहीं हो पाता |
वह पुन:पथभ्रष्ट नहीं होता |'
'हे अर्जुन!
ईश्वर की भक्ति में
जाति-वर्ण-लिंग-भेद नहीं |
ईश्वर वर्ण भेद नहीं करता |
कर्मो से वर्ण भेद हो सकता |
मेरी भक्ति में जाति-वर्ण-लिंग
का भेद नहीं |
जो भी है वह प्राणी मात्र,
मेरा ही वह अंग है |
अपने अंगों से
मुझे सम प्रेम भाव
मेरे लिए पुरुष-स्त्री,
शूद्ध-वैश्य-ब्राह्मंण
और चण्डाल सभी एक समान,
मेरे भक्त सदा ही महान |
मेरी शरण में जो कोई आता,
वह परम गति को पाता |
वह मेरे धाम चला आता |'
'जब दुराचारी भी
व्यभिचार छोड़
मेरे भक्त बन सकते,
फिर उस ब्राह्मण का क्या कहना,
जो नित्य-निरन्तर मेरी भक्ति में
मग्न रहता |'
'राजा होकर भी जो
ऋषियों-सा करे आचरण,
शुद्ध स्वभाव से करे जीवन-यापन,
वह राजर्षि सदा परम गति को पाते है |'
'सुखरहित-क्षण भंगुर शरीर
को भूल जाओ,
निरन्तर ईश्वर-भक्ति करो,
ईश्वरीय भाव में रत होकर
कर्म करो,
ईश्वर में मन लगाओ,
ईश्वर की आराधना करो,
ईश्वर में आत्मा अपनी स्थित करो,
देखो! स्वयं देखो
ईश्वर स्वयं प्रकट होगा |
ईश्वर भाव जागृत रहेगा
और ईश्वर तुम्हें मिल जाएगा |'
ज्ञात-अज्ञात सब विद्याओं का ज्ञाता |
परिपूर्ण है विज्ञान से,
अति पवित्र, अति उत्तम,
प्रत्यक्ष फल देने वाला,
प्रत्यक्ष दर्शन ईश्वर का दे जो,
यह धर्म युक्त,
समझो तो अति सुगम |
यह परम अविनाशी |'
'हे परन्तप!
श्रद्धा से यह ज्ञान समझ सकते,
श्रद्धा रहित
यह भाव समझ न पाता |
संशयों से वह घिरा रहता |
राह भटक,
संसार चक्र में वह भटकता |
बार-बार जन्म लेता,
आकर फिर लौट जाता |
भोगों में ही रत रहता,
योग कभी न जान पाता |
ज्ञान भी, विज्ञान भी,
समझ से उसकी परे रहता |
ईश्वर को वह जान न पाता |
ईश्वर को वह पा न पाता |'
'आकाश से जैसे
वायु-जल-तेज-पृथ्वी,
सुवर्ण से गहने,
मिट्टी से बर्तन व्याप्त रहते,
वैसे ही यह विश्व सारा
सगुण-निराकार परमात्मा में व्याप्त सदा |
सब प्राणी जन
मेरे संकल्प में आधार स्थित |
यदि देखो तो वास्तव में
मैं उनमें स्थित नहीं कहीं |
असाधारण योग शक्ति को मेरी देखो
समस्त जगत मुझमें स्थित है
और मैं फिर भी स्थित नहीं कहीं
कारण भी मैं हूँ तुम्हारा,
आधार भी मैं हूँ तुम्हारा |
सर्वव्यापकता
को मेरी समझ,
मैं तुझमें होकर
भी
तुम्हारी स्थिति
से विरक्त हूँ |'
'निर्लिप्त भाव से
इस प्रकृति की
मैंने रचना कर दी |
इस भाव से मैं
विरक्त हूँ |
तुम मानो तुम्हारे साथ हूँ,
तुम मानो तुम्हारे ज्ञान हूँ |
पर मैं होकर भी
तुममें स्थित नहीं हूँ|'
बादलों का
आधार आकाश है जैसे
पर बादल उसमें सदा नहीं रहते |
अनित्य हैं, स्थिर सत्ता नहीं उनकी |
ऐसे में आकाश सदा रहता,
और बादल हैं या नहीं कहीं,
आकाश सदा व्याप्त रहता |
उसकी स्थिरता बनी रहती |
'सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड
मेरी योग शक्ति से निर्मित,
प्राणी का आधार वही |
जगत है, मुझसे है |
प्राणी है, मुझसे है |
मैं प्राणी-मात्र से स्थित नहीं |'
'मेरी योग शक्ति को देखो |
प्राणी को धारण करने वाला,
प्राणी का पोषण करने वाला
प्राणी को उत्पन्न करने वाला
निर्लिप्त भाव से कैसे
अपनी स्थिति में स्थित होकर
प्राणी मात्र में स्थित नहीं ||
आकाश से उत्पन्न होकर
वायु सर्वत्र विचरती,
आकाश में सदा स्थित रहती |
मेरे संकल्पों से उत्पन्न प्राणी,
सर्वत्र-सदा मुझमें स्थित रहता |
तब भी इस प्राणी मात्र के
मोह भाव से मैं मुक्त रहता |
इस प्राणी मात्र के विकारों का
सर्वथा मुझमें अभाव रहता |'
'हे अर्जुन!
ब्रह्म की आयु जब पूर्ण होती,
कल्पों का जब क्षय हो जाता,
महाप्रलय के उस काल में,
सब प्रकृति जनित प्राणी
नष्ट हो जाते |
सब मेरी प्रकृति में लीन हो जाते |
कल्प रात्रि के बीत जाने पर,
मैं नई प्रकृति का निर्माण करता |
मैं नए रुप फिर स्थापित करता
फिर से एक नई सुबह होती |
अपनी प्रकृति में नए रुप रचता |
अपने गुण-कर्म-स्वभाव के
बन्धन से जो जकड़ा रहता,
वह नए कल्प में
अपने स्वभाव के अनुरुप जन्म लेता |
वह फिर से
इस सृष्टि के आदि रुप में जन्म लेता |
जब तक मेरी
इस प्रकृति के वश में
प्राणी रहता,
तब तक उसका जन्म होता |
वह हर नई सुबह
हर नयी शाम को
एक नया रूप धरता |
मेरे स्वरूप को जो जान लेता |
मेरी शरण में जो आ जाता,
वह मुझे ही प्राप्त हो जाता,
वह मेरे रूप में ही
समा जाता |'
'हे अर्जुन!
मैं अपनी
सृष्टि-संरचना की
कर्म लीला से
आसक्ति नहीं करता |
प्रकृति रचित जो जैसा
कर्म करता,
जिसके जैसे गुण हो जाते
मैं निर्लिप्त भाव से
उनके कर्मो से उदासीन रहता |
जैसे प्रकृति को रच कर,
उस प्रकृति के हर प्राणी में
बसकर भी,
मैं आसक्त नहीं होता,
कर्म करके भी
कर्म बन्धन में नही बँधता |
मुझे कर्मो के फलस्वरुप
हर्ष-शोक-सुख-दु:ख का
भाव नहीं होता,
वैसे ही प्राणी यदि
ऐसा भाव स्थापित करे
तो वह कर्म बन्धन से मुक्त हो सकता |
मेरी तरह प्रकृति का होकर भी,
कर्मो को निभाकर भी,
मेरे रुप में समा सकता |'
'हे अर्जुन!
मेरी अध्यक्षता में
प्रकृति अपना कर्तव्य निभाती |
मैने प्रकृति को सत्ता-स्फूर्ति प्रदान कीं,
समस्त जगत की उत्पत्ति-स्थिति और
संहार की क्रियाएँ प्रदान कीं |
यह चक्र सदा चलता रहा है,
और सदा चलता रहेगा |'
'मेरी सर्वव्यापकता को न समझ,
मूढ लोग मुझे तुच्छ समझते |
मेरी प्रकृति को मुझसे अलग मानते |
मैं मनुष्य रुप में आया,
लोकहित हेतु |'
'यह लीला रची मैंने
धर्म स्थापना हेतु |
मेरी अवज्ञा करते
अज्ञानता से,
मुझे साधारण पुरुष मानते
अपने अहँ में डूबे |
ऐसे अहँकारी जन,
व्यर्थतम आशाओं में डूबे,
व्यर्थ कर्मो में रत,
विक्षिप्त चित्त, अज्ञान भाव से
अन्धकारमयी स्वरुप दे
स्वयं को ज्ञानी समझते |'
'राक्षसी भाव लिए,
द्वेष भाव से दूसरों का
अनिष्ट करते,
दूसरों को दु:ख पहुँचाते |
काम-लोभ के वश में होकर,
आसुरी प्रकृति में लिप्त हुए,
दूसरों से क्लेश रखते,
उनके स्वत्व हरण में लगे रहते |'
'मोह के वशीभूत होकर,
प्रमाद से प्रेरित हुए
मोहिनी प्रकृति युक्त पुरुष,
अपनी इच्छा पूर्ति मं
दूसरों को दु:ख पहुँचाते|
वे आसुर स्वभाव पर
आश्रित होते |
प्रकृति के स्वरुप से
उलट भाव में स्थित रहते |'
'परन्तु हे कुन्तीपुत्र!
जो दैवी प्रकृति पर आश्रित होता,
वह प्रकृति के स्वरुप को समझता |
वह प्रकृति के अनुरुप चलता |
वह विलक्षण जन मुझे
सब प्राणियों का सनातन कारण जानता |
वह मुझे नाशरहित, अक्षर-ब्रह्म जानकर
अनन्य मन से मुक्त होकर,
मेरे ज्ञान-रस में डूबा,
मेरे कर्म-ज्ञान को जान कर,
मुझमें निरन्तर स्थापित रहता |
मुझको निरन्तर स्मरण करता |'
वह दृढ-निश्चयी होता |
मेरे नाम-गुण का ज्ञान रखता,
उसे सदा स्मरण करता |
मुझे पाने का यत्न करता |
कर्म करता,
लोकहित का चिन्तन करता,
मेरे ध्यान में चित्त लगाता,
मेरी राह पाने को आतुर रहता,
अनन्य भाव से मेरी उपासना करता |'
'ज्ञान योगी
ज्ञान यज्ञ से
अभिन्न भाव से,
निर्गुण-निराकार ब्रह्म की
उपासना करते |
ज्ञानयोगी
कर्तापन के अभिमान से रहित रहकर,
शरीर-इन्द्रिय और मन द्वारा
होने वाले समस्त कर्मो में,
गुणों को गुण ही बरतते,
सम्पूर्ण दृश्यवर्ग को मृगतृष्णा के जल सदृश
समझते |
एक निर्गुण-निराकार परब्रह्म
की सत्ता ही स्वीकारते |
उसी का श्रवण-मनन-चिन्तन करते,
अभिन्न भाव से उसी में स्थित रहते |'
'ज्ञानी जन ऐसे भी होते,
जो सम्पूर्ण विश्व को
ईश्वर से उत्पन्न हुआ मान,
उसी में सभी कुछ व्याप्त है मानते |
विश्वरुप में स्थित मान ईश्वर को,
सूर्य-चन्द्र-अग्नि-इन्द्र-वरुण
एवं सभी प्राणियों को
ईश्वर का स्वरुप मानते |
कर्मो के प्रतिपादन से वे
यथायोग्य निष्काम भाव से पूजा करते |
जो जैसे रुप में
मेरा रुप देखता,
जो जैसा मेरा
स्वरुप समझता
वैसा ही वह मुझको पूजता |'
'सब यज्ञों का आदि भी मैं हूँ,
सब यज्ञों का अन्त भी मैं हूँ |
क्रतु, यज्ञ और स्वधा भी मैं हूँ |
औषधि-घृत और मन्त्र भी मैं हूँ |
अग्नि भी मैं हूँ,
और यज्ञ की सभी क्रियाएँ
मुझसे ही सम्पूर्ण होतीं |
मेरे रुप अनेक,
मैं हर नए भाव में दिखता |
जो जैसा कुछ देखता,
मेरा भाव उसे वैसा ही मिलता |'
'मै कण-कण में हूँ विराजमान,
मेरा रुप रचे नित नए विधान |
सम्पूर्ण जगत है धारण मुझमें |
कर्मो का फल निर्धारित
करना मेरे विधान में आता |
माता-पिता-पितामह के रुप में
मैं सर्वत्र दृष्टिगत होत |'
'जो प्राणी मात्र को विशुद्ध कर दे
वह ओंकार भी मैं हूँ |
ज्ञान का भण्डार रचा जो
वह ऋगवेद, सामवेद और
यजुर्वेद भी मैं हूँ |
सब मेरे की स्वरुप है,
सभी ईश्वर के विभिन्न रुप है |'
'जिसे परम धाम तू कहता,
वह परम धाम है मेरा रुप |
सम्पूर्ण जगत का रक्षण करने वाला,
सबका पालनहार भी मैं हूँ |
समस्त कर्मो का
शुभ-अशुभ भी मैं हूँ |
सब का एक निवास है मुझमें |'
'प्रत्युपकार न चाहकर
उपकार ही करता |
सब का हित हूँ चाहने वाला |
उत्पत्ति-प्रलय का
हेतु सबकी |
सबका आधार-निधान,
और
अविनाशी कारण भी
मैं हूँ |'
'मैं सूर्य से तपता हूँ,
वर्षा का आकर्षण करता हूँ,
उसे धरा पर बरसाता हूँ |
हे अर्जुन!
मैं ही अमृत और मृत्यु भी मैं हूँ |
मैं ही सत्
और असत् भी मैं हूँ |'
'तीनों वेदों के विधान से
चलकर
साकाम कर्म जो करते,
कर्म काण्ड से श्रद्धा व प्रेम करते |
मेरी सर्वरुपता से अनभिज्ञ होकर,
सोमरस का पान जो करते,
पाप रहित होकर,
स्वर्ग प्राप्ति की चाह लिए,
वे मेरी उपासना करते|
वे पुण्य करते, पाप नहीं करते,
बस कामनाओं का अभाव नहीं होता |
वे स्वर्ग लोक को जाते,
देवताओं का सानिध्य पाते,
अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर पाते |
अपने पुण्यों के बल पर
स्वर्ग लोक में आनन्द उठाते |
पुण्यों का हिसाब पूरा कर
लौट धरा पर वापिस आते |'
'एक नया अध्याय
फिर से आरम्भ हो जाता |
वेदों में कहे
साकाम कर्म भाव से,
साधन तो कर लेते साधक,
स्वर्ग को पाने का |
पर भूले रहते
जीवन के मूल तत्व को |
बार-बार का
यह आना-जाना
कभी नहीं रुक पाता |
पुण्य का प्रभाव
स्वर्ग ले जाता,
क्षीण हुआ तो
मानव लौट धरती पर आता |'
'यह चक्र सदा चलता
रहता |
जो अनन्य भक्त
ईश्वर का चिन्तन करते |
निष्काम भाव से
ईश्वर को भजते,
पाप-पुण्य का,
इच्छा-आसक्ति का
अभाव करते,
वे नित्य-निरन्तर
चलते-चलते,
कर्म की राह पर आगे बढ़ते,
मेरे परम धाम में आ जाते |
मुझे स्वयं प्राप्त हो जाते |
सब बन्धन क्षण भर में
छूट जाते |'
'हे अर्जुन!
कामना-सिद्धि को
जो पूजा करता देवताओं की,
वह विधि पूर्वक तभी कहलाती
जब साकाम भक्त
देवता को ईश्वर का ही एक रुप मानता |'
'जो इस तत्व को न समझकर,
देवताओं को ईश्वर से भिन्न मानता,
उसका पूजन अज्ञान युक्त,
अविधि युक्त कहलाता |'
'युक्त विश्व विराट,
विराट रुप ईश्वर का |
प्राणी-देवता-सबका
नियन्ता ईश्वर |
जो इस तत्व को जाने नहीं,
वह ईशवर को न पा पाता |
वह पुनर्जन्म को प्राप्त होता |
वह लौट धरा पर फिर से आता |'
'देवताओं को पूजकर,
देवताओं को पाते |
पितरों को पूजकर,
पितरों को पाते |
देव-पितरों की पूजा
साकाम भाव से युक्त ही होती |
अपना फल देकर नष्ट हो जाती |'
'देवताओं को पूजो,
पितरों को पूजो,
ईश्वर के भाव मान कर पूजो,
निष्काम भाव से पूजो
तभी सहज ईश्वर पाओगे |'
'भूतों को पूजकर,
भूतों को ही पाते |
वे तामसी भाव के पूजक होते,
अनिष्ट फल किसी और का चाहते |
वे मेरी भक्ति की परिधि में नहीं आते |'
मेरी पूजा निष्काम भाव से,
उपसना करो आसक्ति त्याग के,
पुनर्जन्म नहीं, मुझसे मिलन हो जाएगा |
मेरा भक्त निश्चय ही मुझे पाएगा |'
'वर्ण-आश्रम-जाति का भेद नहीं |
भक्त की कोई और श्रेणी नहीं होती |
भक्त बस भक्त ही कहलाता |
बल-रुप-धन-आयु-जाति
गुण-विद्या का भेद नहीं होता |
भक्ति में विश्वास प्रबल होता |
भक्ति में भाव प्रबल होता |'
'प्रेम भाव से
पत्र-पुष्प-फल-जल,
शुद्ध बुद्धि, निष्काम भाव से
जो कुछ भी प्रेम भाव से
मुझको अर्पित कर देता,
मैं प्रेम भाव से ग्रहण करता |
मैं नित नए सगुण रुप धर कर
प्रीति सहित ग्रहण कर लेता |'
'हे अर्जुन!
अर्पण कर अपने कर्म को,
अर्पण कर अपने अन्न को,
अर्पण कर यज्ञ-दान-तप को,
सब अर्पण कर ईश्वर को |'
'समस्त कर्म जो
अर्पण कर दे,
ईश्वर भाव में स्थित हो जाए |
सन्यास भाव मन में
आ जाए,
दृढ-निश्चय के साथ
स्वयं शुभाशुभ कर्मो
से मुक्त हो जाए |
अभाव हो जाए
कर्मफल का,
उसी अभाव में वह ईश्वर
पा जाए |
वह मुक्त हो जाए,
वह ईश्वर को पा जाए |'
'मैं सब प्राणियों में
समभाव रखता,
नहीं किसी से राग-द्वेष,
प्रिय-अप्रिय का भाव नहीं है |
जो मुझे स्मरण करता,
मैं भी उसको स्मरण रखता हूँ |
प्रेम भाव से जो चाह मेरी करता,
मैं प्रेम भाव से उसे मिलता हूँ |
जो मुझमें निष्ठा स्थापित रखते,
मैं उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देता हूँ |'
'अतिशय दुराचारी मेरा स्मरण यदि करता,
शुभ संस्कार यदि जागृत हो उठता,
पापों से आसक्ति त्याग,
मुझे स्मरण करने लगता,
वह साधु भाव को प्राप्त होता |
उसके दृढ-निश्चय को मैं नतमस्तक |'
'मेरे भाव को जिसने जान लिया,
उसे स्वयं आसक्ति से
विरक्ति मिल जाती |
मन द्वेष भाव से मुक्त हो जाता |
वह धर्मात्मा हो जाता,
वह परम शाँति को पा लेता |'
'वह मेरा साधन
अपना लेता,
वह नष्ट नहीं हो पाता |
वह पुन:पथभ्रष्ट नहीं होता |'
'हे अर्जुन!
ईश्वर की भक्ति में
जाति-वर्ण-लिंग-भेद नहीं |
ईश्वर वर्ण भेद नहीं करता |
कर्मो से वर्ण भेद हो सकता |
मेरी भक्ति में जाति-वर्ण-लिंग
का भेद नहीं |
जो भी है वह प्राणी मात्र,
मेरा ही वह अंग है |
अपने अंगों से
मुझे सम प्रेम भाव
मेरे लिए पुरुष-स्त्री,
शूद्ध-वैश्य-ब्राह्मंण
और चण्डाल सभी एक समान,
मेरे भक्त सदा ही महान |
मेरी शरण में जो कोई आता,
वह परम गति को पाता |
वह मेरे धाम चला आता |'
'जब दुराचारी भी
व्यभिचार छोड़
मेरे भक्त बन सकते,
फिर उस ब्राह्मण का क्या कहना,
जो नित्य-निरन्तर मेरी भक्ति में
मग्न रहता |'
'राजा होकर भी जो
ऋषियों-सा करे आचरण,
शुद्ध स्वभाव से करे जीवन-यापन,
वह राजर्षि सदा परम गति को पाते है |'
'सुखरहित-क्षण भंगुर शरीर
को भूल जाओ,
निरन्तर ईश्वर-भक्ति करो,
ईश्वरीय भाव में रत होकर
कर्म करो,
ईश्वर में मन लगाओ,
ईश्वर की आराधना करो,
ईश्वर में आत्मा अपनी स्थित करो,
देखो! स्वयं देखो
ईश्वर स्वयं प्रकट होगा |
ईश्वर भाव जागृत रहेगा
और ईश्वर तुम्हें मिल जाएगा |'
कविता अनुवाद
अश्विनी कपूर
Friday, 22 March 2013
chanakya niti
chanakya niti
जिन लोगों के मन में पाप होता है उनसे बचकर रहना चाहिए।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि...
यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम्।
व्याधो मृगवधं गन्तुं गीतं गायति सुस्वरम्।।
इस शृलोक में आचार्य कहते हैं जिन लोगों के मन में पाप होता है उनसे बचकर रहना चाहिए। जो लोग हमारे सामने बहुत मीठा बोलते हैं, हितेषी बनते हैं लेकिन पीठ पीछे हमें नुकसान पहुंचाने या हमारा अनुचित फायदा उठाने की योजना बनाते रहते हैं उनसे बचना चाहिए।जंगल में कोई बहेलिया पक्षियों को अपने जाल में फंसाने के लिए मधुर गीत गाता है और पक्षी मीठी आवाज के कारण बहेलिए के जाल में फंस जाते हैं। इसी प्रकार हमें नुकसान पहुंचाने वाले लोग पहले बहुत मीठा-मीठा बोलते हैं, उनके मीठे व्यवहार में जो लोग फंस जाते हैं वे खुद का नुकसान कर बैठते हैं।
जिस प्रकार कोई सपेरा मधुर बीन बजाकर किसी भी सांप को अपने काबू में कर सकता है ठीक उसी प्रकार वे लोग जिनके मन में पाप होता है वे भी अपने शिकार को इसी तरह फंसते हैं।समझदार इंसान को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हमें किसी की मीठी बातों में नहीं फंसना चाहिए। व्यक्ति थोड़े से लालच में फंसकर बड़ी रकम भी खतरे में डाल देता है। कोई व्यक्ति जुएं में ज्यादा पैसा कमाने के लालच में अपनी पूंजी बर्बाद कर देता है। अत: किसी भी प्रकार के लोभ के वश में कोई कार्य नहीं करना चाहिए। किसी के झूठे मायाजाल में फंसकर केवल धन ही नहीं स्वयं के जीवन को भी संकट में डालना नहीं चाहिए।
worship and days
worship and days
कौन सा काम होता है सफल किस देवता की पूजा से
रविवार - भगवान सूर्य देव की पूजा। गृह प्रवेश कार्य, स्वास्थ्य संबंधी उपचार।
सोमवार - शिव व अग्रिदेव पूजा। अग्रि से जुड़े कार्य, यज्ञ, हवन, लिपाई-पुताई, गृह निर्माण का आरम्भ आदि।
मंगलवार - मंगलदेव, श्रीहनुमान पूजा। पदग्रहण, पराक्रम, शौर्य व शस्त्र अभ्यास से जुड़े काम।
बुधवार - श्रीगणेश पूजा। हर तरह की कार्यसिद्धि, सलाह-मन्त्रणा, यात्रा, कारोबार।
गुरुवार - गुरु, बृहस्पतिदेव, दत्तपूजा। धार्मिक व देव कार्य, वेदपाठ, नए वस्त्र व गहने पहनना।
शुक्रवार - देवी व शुक्र पूजा। दान, कन्यादान, स्त्री से जुड़े कार्य, वाहन संबंधी कार्य।
शनिवार - शनि, शिव पूजा। गृहस्थी से जुड़े कार्य, गृहप्रवेश, गृहारम्भ, व्यवसाय।
Thursday, 21 March 2013
teji mandi
मुग सोना चांदी में मंदी ता. 21
मुगफली गुड़ में मंदी ता.22
सोना चांदी में मंदी २३
तुअर में मंदी ता. 21
मुगफली गुड़ में मंदी ता.22
सोना चांदी में मंदी २३
तुअर में मंदी ता. 21
holi mai kare hanuman avmlaxmi v holika pujan
होली की रात जरूर करें हनुमानजी और मां लक्ष्मी एवम होलिक पूजन
holi mai kare hanuman avmlaxmi v holika pujan
होली के उपाय---होली में शाम के समय पूजन समग्री के साथ होलिक का पूजनकरे दीपकजलावे एवम 2 पानलोंगबताशे गोमती चक्र अपने हाथ में लेकर होलिक कि परिक्रमा [7 ] करे एवम मनोकामना बोले दुसरे दिन होली कि राख घर पर स्नान के पहले अपने शरीर पर लगा स्नानकरे नव ग्रह पीड़ा शांत होती है एवम बेरोजगारी, प्रमोशन, व्यापार की समस्याएं समाप्त हो जाती हैंव लाभ होता है
बुधवार, 27 मार्च 2013 को होली का त्यौहार है। एक ओर जहां रंगों से होली खेली जाती है वहीं दूसरी ओर होली की रात में पूजन-पाठ का भी विशेष महत्व है। होली पर यदि सही चमत्कारी उपाय किए जाए तो जीवन से सभी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है।
महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए एक अन्य उपाय के अनुसार देवी की विधिवत पूजा के बाद लक्ष्मी मंत्र ऊँ महालक्ष्म्यै नम: मंत्र का जप 11 हजार बार करना चाहिए। मंत्र जप के लिए कमल के गट्टे की माला का प्रयोग करना श्रेष्ठ रहता है। इस उपाय से बेरोजगारी, प्रमोशन, व्यापार की समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।सभी कार्यों में सफलता और पारिवारिक सुख की इच्छा रखने वाले लोगों को होली की रात हनुमानजी की विशेष पूजा करनी चाहिए। इसके लिए होली की रात में स्नान आदि करके पवित्र हो जाएं। यदि आपकी सुविधा हो तो किसी हनुमान मंदिर जाएं अन्यथा घर पर हनुमानजी की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर पूजन करें। पूजन में हनुमानजी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें। चोला चढ़ाएं। विधि-विधान से पूजन करें। हार-फूल, प्रसाद आदि चढ़ाएं। आरती करें। यदि प्रसाद के रूप में गुड़-चने चढ़ाएंगे तो यह श्रेष्ठ रहेगा। पूजन के बाद प्रसाद अन्य लोगों को वितरित कर देना चाहिए।होली की रात को यदि संभव हो तो किसी शिव मंदिर में शिवलिंग के सम्मुख दीपक जलाएं। रात के समय शिवलिंग के पास दीपक जलाने से महादेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो भी व्यक्ति यह उपाय करता है उसकी धन संबंधी परेशानियां समाप्त हो जाती हैं।
muktajyotishs@gmail.com
Sunday, 17 March 2013
sabari ki nvdha bhakti ram chritmans mai
sabari ki nvdha bhakti ram chritmans mai
शबरी कि
नवधा भक्ति
रामचरितमानस में
रामचरितमानस में मिले वर्णन के अनुसार जब रामजी उदार शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने रामचंद्रजी को देखा, तब मुनि मतंगजी की बात शबरी को याद आई व उसका चेहरा खिल गया। वह प्रभु को देखकर प्रेम मग्र हो गई। फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गई वह बोली मैं नीच जाति की मंदबुद्धि हूं मैं नहीं जानती कि आपकी स्तुति कैसे करूं। तब श्रीरामजी ने उस पर प्रसन्न होते हुए कहा मैं तुझे नवधा भक्ति कहता हूं। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर ले। जो भी ये भक्ति करता है मैं उस पर प्रसन्न हो जाता हूं।
पहली भक्ति- संतों का संग
दूसरी भक्ति- कथा प्रसंग में प्रेम
तीसरी भक्ति- अभिमान रहित होकर गुरु की सेवा।
चौथी भक्ति- गुणसमुहों का गान।
पांचवी भक्ति- मंत्र जप।
छटी भक्ति- अच्छा चरित्र।
सातवी भक्ति- संतो की भक्ति।
आठवी भक्ति- जो कुछ मिल जाए उसी में संतोष करना।
नवी भक्ति- कपटरहित बर्ताव करना।
फिर तुझमें सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है। इन नौ प्रकार की भक्ति के कारण ही जो गतियां योगियों को भी नहीं मिल पाती हैं। वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई हैं। ऐसी भक्ति करने के कारण ही आज तुझे मेरे दर्शन सुलभ हो गए हैं।
शबरी कि
नवधा भक्ति
रामचरितमानस में
रामचरितमानस में मिले वर्णन के अनुसार जब रामजी उदार शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने रामचंद्रजी को देखा, तब मुनि मतंगजी की बात शबरी को याद आई व उसका चेहरा खिल गया। वह प्रभु को देखकर प्रेम मग्र हो गई। फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गई वह बोली मैं नीच जाति की मंदबुद्धि हूं मैं नहीं जानती कि आपकी स्तुति कैसे करूं। तब श्रीरामजी ने उस पर प्रसन्न होते हुए कहा मैं तुझे नवधा भक्ति कहता हूं। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर ले। जो भी ये भक्ति करता है मैं उस पर प्रसन्न हो जाता हूं।
पहली भक्ति- संतों का संग
दूसरी भक्ति- कथा प्रसंग में प्रेम
तीसरी भक्ति- अभिमान रहित होकर गुरु की सेवा।
चौथी भक्ति- गुणसमुहों का गान।
पांचवी भक्ति- मंत्र जप।
छटी भक्ति- अच्छा चरित्र।
सातवी भक्ति- संतो की भक्ति।
आठवी भक्ति- जो कुछ मिल जाए उसी में संतोष करना।
नवी भक्ति- कपटरहित बर्ताव करना।
फिर तुझमें सब प्रकार की भक्ति दृढ़ है। इन नौ प्रकार की भक्ति के कारण ही जो गतियां योगियों को भी नहीं मिल पाती हैं। वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई हैं। ऐसी भक्ति करने के कारण ही आज तुझे मेरे दर्शन सुलभ हो गए हैं।
Friday, 15 March 2013
Thursday, 14 March 2013
this lesson of gita increase
this lesson of gita increase
ताकत व उम्र बढ़ाने जानिए गीता का रहस्य
ताकत व उम्र बढ़ाने जानिए गीता का रहस्य
दरअसल, मानवीय स्वभाव से जुड़ी बुराइयों में से एक ऐसी भी बुराई है, जिससे बुद्धिमान और नासमझ के बीच का फर्क खत्म हो जाता है? यह दोष है - इंद्रिय असंयम। जी हां, अज्ञानतावश इंद्रियों जैसे रस, रूप, गंध, स्पर्श, श्रवण करने वाले अंगो और कर्मेन्द्रियों यानी काम करने वाले अंगों पर संयम न रख पाना इतना अचंभित नहीं करता, किंतु ज्ञानी होने पर भी इन इंद्रियों को वश में न कर पाना बुद्धिदोष माना जाता है, जो किसी इंसान को अज्ञानी, अल्पायु व कमजोर लोगों की कतार में शामिल करने वाला होता है।
हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भवतगीता व अन्य धर्मशास्त्रों में भी इस बात की ओर इशारा कर सावधान रहने के लिए कुछ बातें उजागर हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि-
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरषस्य विपश्र्चित:।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन:।।
जिसका सरल शब्दों में संदेश यही है कि अस्थिर या चंचल स्वभाव वाली इन्द्रियां परिश्रमी व बुद्धिमान इंसान का मन भी बलपूर्वक डांवाडोल कर देती है।
गीता का यह रहस्य शास्त्रों में लिखी इस बात को बल देता है कि -
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति।
इसमें सबक है कि इन्द्रियों पर बहुत ही काबू रखें। क्योंकि शक्तिशाली इंद्रियों के आगे ज्ञानी व्यक्ति भी पस्त हो सकता है।
गीता की इस बात का मतलब यह कतई नहीं है कि इंसानी जीवन में संयम या अनुशासन व्यर्थ है। बल्कि यही सचेत करना है कि हर इंसान में यह कमजोरी होती है। इसे दूर करने के लिए ही हमेशा अच्छे खान-पान, माहौल, विचारों, दृश्यों व बोलों को व्यावहारिक जीवन में अपनाएं। इनसे हर व्यक्ति खुद को हर स्थिति का सामना करने के लिए संयमी और ताकतवर बना सकता है।
Wednesday, 13 March 2013
AMITABH BACHCHAN KI KUNDLI ME RAJYOG [AK VISHLESAN]
AMITABH BACHCHAN KI KUNDLI ME RAJYOG [AK VISHLESAN]
अमिताभ बच्चन कि कुंडली में राजयोग [एक विशलेषण]
जातक का नाम ---अमिताभबच्चन
जन्म समय ------16 :००
जन्म स्थान ------इलाहाबाद
जन्म कुंडली
वर्तमान में केतु महादशा चलरही है |जो कुछ कष्ट व तनाव आदि देती है |
एक विशलेषण--------जातकका जन्म कुभ लग्न में हुआ शनि कि लग्न पर पूर्ण दृष्टि है अत: लम्बा कद आकर्षक व्यक्तित्वका धनी बनता है चतुर्थ स्थान में शनि जनता में प्रसिद्धी दिलाता है जोकरोड़ो दिल पर राज कर रहे है लेकिन शनि कठिन परिश्रम व सघर्ष के बाद ऊचाईयो पर पहुँचाता है |
धन स्थान का स्वामी गुरु उच्च राशी में षष्ठ भाव में एवम धन भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है जो बहुत धनवान प्रसिद्धी कीर्ति ऐश्वर्य सम्मानित बनाता है |
विधा स्थान का स्वामी अष्टम में रहने से गुप्त ज्ञान कला से लाभ दिलाता है बुध महादशा में फल घटित व शुभ करी |
अष्टम में चार ग्रहराजयोग का निमार्ण कर रहे है सभी जानते है वैसे तो जातक कि कुंडली में अनेक शुभ योग बने है कुछ प्रमुख जो सत्य हुए का वर्णन प्रस्तुत है |
केदार योग ------------
गजकेशरी योग --------चन्द्र से केंद्र में उच्चराशी का गुरु --->जातक तेजस्वी धन धान्यसे युक्त मेधावी गुणी राज प्रिय होता है जातक केसरी [शेर ] कि तरह अपने शत्रु वर्गो को नष्ट कर देता है ऐसा जातक सभा औ में प्रोढ़ [जिसका वाणीपर अधिकार हो मन्त्र मुग्ध वाणी तीव्र बुधि महान यश प्राप्त करने वाला अपने स्वाभिक तेज से ही ओरो को जितने वाला मनों अनुकूलकार्य करने वाला तथा सम्मानित पद ओर धन वान प्रबल आदर्श वादी आध्यात्मिक ता में रुचि होती है |
अनफा योग ----------------जातक गंधर्व[गान नृत्य कला ] विधा में लेखन में चतुर भाषण में निपुण राज्य से आदर व सत्कार पाने वाला सुंदर शरीर वाला ओर प्रसिद्ध कार्य कर्ता होता है |
सफल अमल कीर्ति योग ----------
काहल योग -----------जातक ओजस्वी सम्पदा से युक्त अपने क्षेत्र का प्रमुख होता है |
राजयोग ----------सर्वोच्चपद व सम्मानित |
सरल योग ---------अतुल सम्पदा देता है |
महा दीर्घायु योग ---------त्रिकोण में कोई पाप ग्रह न हो शुभ ग्रहओ से केंद्र विहीन हो अष्टम में पाप ग्रह हो तो यह योग होता है |[ग्रथजातक परिजात]
जातक को उत्तम आयु और दिव्य बनाता है |
muktajyotishs@gmail.com
chana mai mandi tuarer mai teji urad mai samayan date 13
chana mai mandi tuarer mai teji urad mai samayan date 13
Saturday, 9 March 2013
davi surop5 stri ke name ke kalyan
सवेरे ले इन5 देवी स्वरूप स्त्रियों का नाम तो होंगे सफल व खुशहाल
davi surop5 stri ke name ke kalyan
धर्मशास्त्रों में बताई ईश्वर की सृजन शक्ति सांसारिक जीवन में स्त्री के जरिए उजागर होती है। धार्मिक नजरिए से देवी पूजा भी सद्गति पाने और दुर्गति को टालने के लिए इसी शक्ति का सम्मान व आवाहन है।
आज महिला दिवस है, जो मौका है, केवल आज ही नहीं, बल्कि हर दिन स्त्री की उसी शक्ति के पहलुओं को जानने-समझने और कद्र करने का, जिसके जरिए रिश्ते, घर, समाज, राष्ट्र और पूरे संसार का वजूद टिका होता है।
महिला दिवस के साथ शुक्रवार व शिव नवरात्रि का का भी संयोग बना है। जहां शुक्रवार देवी पूजा का तो शिव नवरात्रि भी, जो शिव-शक्ति की एकरूपता के स्मरण से सारे दु:खों से छुटकारे की अचूक घड़ी है।
इस संयोग व हर दिन भी धार्मिक नजरिए से बताया एक छोटा सा उपाय सवेरे स्त्री के अलावा खासतौर पर पुरुष करें तो माना जाता है कि वह कभी भी असफलता व तंगहाली का सामना नहीं करता, बल्कि तमाम सुख व वैभव के साथ जीवन गुजारता है। यह उपाय है धर्मशास्त्रों में उजागर ऐसे पावन स्त्री चरित्रों का स्मरण, जिन्होंने तमाम कठिनाइयों में भी धर्म व सच्चाई दामन संकल्प के थामे रखा व पुरुष चरित्रों की शक्ति बनी
जानिए ऐसे ही 2 मंत्र जिनके जरिए देवी स्वरूप स्त्री चरित्रों का रोज सुबह देव पूजा के दौरान स्मरण सौभाग्य बढ़ाने वाला और पापों का नाश करने वाला माना गया है -
उमा, उषा च वैदेही रमा गंगेति पञ्चकम्।
प्रातरेव स्मरेनित्यं सौभाग्यंवर्द्धते सदा।।
यानी सुबह उमा, उषा च वैदेही रमा गंगा का नाम लेने भर से सुख-सौभाग्य बढ़ता है।
इसी तरह इन 5 कन्याओं का स्मरण भी मंगलकारी माना गया है।
अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा।
पंचकन्या: स्मरेतन्नित्यं महापातकनाशम्॥
यानी अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी इन 5 धर्मनिष्ठ कन्याओं का नाम लेने से सारे पाप धुल जाते हैं।
dharm granth se
parad shivling ke labha
भगवान शिव का रूप है पारद शिवलिंग,
parad shivling ke labha
लिंगकोटिसहस्त्रस्य यत्फलं सम्यगर्चनात्।
तत्फलं कोटिगुणितं रसलिंगार्चनाद् भवेत्।।
ब्रह्महत्या सहस्त्राणि गौहत्याया: शतानि च।
तत्क्षणद्विलयं यान्ति रसलिंगस्य दर्शनात्।।
स्पर्शनात्प्राप्यत मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम्।।
अर्थात- करोड़ों शिवलिंगों के पूजन से जो फल प्राप्त होता है, उससे भी करोड़ गुना फल पारद शिवलिंग की पूजा और दर्शन से प्राप्त होता है। पारद शिवलिंग के स्पर्श मात्र से मुक्ति प्राप्त होती है।- पारद की उत्पत्ति भगवान शंकर के वीर्य से हुई मानी जाती है इसीलिए धर्मशास्त्रों में इसे साक्षात शिव माना गया है। शुद्ध पारद संस्कार द्वारा बंधन करके जिस देवी-देवता की प्रतिमा बनाई जाती है, वह स्वयं सिद्ध होती है।- पारदलिंग का दर्शन महापुण्य दाता है। इसके दर्शन से सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है। जिस घर में पारद शिवलिंग की नियमित पूजन होता है, वहां सभी प्रकार के लौकिक और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है।- किसी भी प्रकार की कमी उस घर में नहीं होती, क्योंकि वहां लक्ष्मी का वास होता है। इसके अलावा वहां का वास्तुदोष भी समाप्त हो जाता है। प्रत्येक सोमवार को पारद शिवलिंग का अभिषेक-पूजन करने से तांत्रिक प्रयोग नष्ट हो जाते हैं।
mahashivratri me kari kalsarp shanti ke uapya
महाशिवरात्रि में करें अचूक उपाय
mahashivratri me kari kalsarp shanti ke uapya
आपकी कुंडली में कालसर्प दोष है तो करें अचूक उपाय
1 - महाशिवरात्रि के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद चांदी से निर्मित नाग-नागिन की पूजा करें और सफेद फूल के साथ इसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। कालसर्प दोष से राहत पाने का ये अचूक उपाय है।
2 - महाशिवरात्रि के दिन सुबह नित्य कर्म करने के बाद किसी शिव मंदिर में जाकर लघु रुद्र का पाठ स्वयं करें या किसी योग्य पंडित से करवाएं। ये पाठ विधि-विधान पूर्वक होना चाहिए।
3 - सफेद फूल, बताशे, कच्चा दूध, सफेद कपड़ा, चावल व सफेद मिठाई बहते हुए जल में प्रवाहित करें और कालसर्प दोष की शांति के लिए शेषनाग से प्रार्थना करें।
4 - सुबह नहाने के बाद समीप स्थित शिव मंदिर जाएं और शिवलिंग पर तांबे का नाग चढ़ाएं। इसके बाद वहां बैठकर महामृत्युंजय मंत्र का जप करें और शिवजी से कालसर्प दोष मुक्ति के लिए प्रार्थना करें।
5- महाशिवरात्रि के दिन गरीबों को अपनी शक्ति के अनुसार दान करें व नवनाग स्तोत्र का पाठ करें। शाम के समय पीपल के वृक्ष की पूजा करें तथा पीपल के नीचे दीपक जलाएं।
6- कालसर्प यंत्र की स्थापना करें। प्रतिदिन विधि-विधान पूर्वक इसका पूजन करने से भी कालसर्प दोष से राहत मिलती है।
muktajyotishs@gmail.com
Wednesday, 6 March 2013
ashtangayoga
जानिए अष्टांग योग को
क्या है राज योग?
ashtangayoga
महर्षि पतंजलि के योग को ही अष्टांग योग या राजयोग कहा जाता है। योग के उक्त आठ अंगों में ही सभी तरह के योग का समावेश हो जाता है। भगवान बुद्ध का आष्टांगिक मार्ग भी योग के उक्त आठ अंगों का ही हिस्सा है। हालांकि योग सूत्र के आष्टांग योग बुद्ध के बाद की रचना है।
अष्टांग योग : इसी योग का सर्वाधिक प्रचलन और महत्व है। इसी योग को हम अष्टांग योग योग के नाम से जानते हैं। अष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। दरअसल पतंजलि ने योग की समस्त विद्याओं को आठ अंगों में श्रेणीबद्ध कर दिया है। लगभग 200 ईपू में महर्षि पतंजलि ने योग को लिखित रूप में संग्रहित किया और योग-सूत्र की रचना की। योग-सूत्र की रचना के कारण पतंजलि को योग का पिता कहा जाता है।
यह आठ अंग हैं- (1)यम (2)नियम (3)आसन (4) प्राणायाम (5)प्रत्याहार (6)धारणा (7) ध्यान (8)समाधि। उक्त आठ अंगों के अपने-अपने उप अंग भी हैं। वर्तमान में योग के तीन ही अंग प्रचलन में हैं- आसन, प्राणायाम और ध्यान।
योग सूत्र : 200 ई.पू. रचित महर्षि पतंजलि का 'योगसूत्र' योग दर्शन का प्रथम व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन है। योगदर्शन इन चार विस्तृत भाग, जिन्हें इस ग्रंथ में पाद कहा गया है, में विभाजित है- समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद तथा कैवल्यपाद।
प्रथम पाद का मुख्य विषय चित्त की विभिन्न वृत्तियों के नियमन से समाधि के द्वारा आत्म साक्षात्कार करना है। द्वितीय पाद में पाँच बहिरंग साधन- यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार का विवेचन है। तृतीय पाद में अंतरंग तीन धारणा, ध्यान और समाधि का वर्णन है। इसमें योगाभ्यास के दौरान प्राप्त होने वाली विभिन्न सिद्धियों का भी उल्लेख हुआ है, किन्तु ऋषि के अनुसार वे समाधि के मार्ग की बाधाएँ ही हैं। चतुर्थ कैवल्यपाद मुक्ति की वह परमोच्च अवस्था है, जहाँ एक योग साधक अपने मूल स्रोत से एकाकार हो जाता है।
दूसरे ही सूत्र में योग की परिभाषा देते हुए पतंजलि कहते हैं- 'योगाश्चित्त वृत्तिनिरोधः'। अर्थात योग चित्त की वृत्तियों का संयमन है। चित्त वृत्तियों के निरोध के लिए महर्षि पतंजलि ने द्वितीय और तृतीय पाद में जिस अष्टांग योग साधन का उपदेश दिया है, उसका संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है:-
1).यम: कायिक, वाचिक तथा मानसिक इस संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य जैसे अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं। इनका पालन न करने से व्यक्ति का जीवन और समाज दोनों ही दुष्प्रभावित होते हैं।
(2).नियम: मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान का समावेश है। शौच में बाह्य तथा आन्तर दोनों ही प्रकार की शुद्धि समाविष्ट है।
(3).आसन: पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है। परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे संबंधित 'हठयोग प्रतीपिका' 'घरेण्ड संहिता' तथा 'योगाशिखोपनिषद्' में विस्तार से वर्णन मिलता है।
(4).प्राणायाम: योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।
(5).प्रत्याहार: इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अन्तर्मुखिता की स्थिति प्राप्त करता है।
(6).धारणा: चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
(7).ध्यान: जब ध्येय वस्तु का चिंतन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
(8).समाधि: यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।
समाधि की भी दो श्रेणियाँ हैं : सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।।इति।।
पतंजलि योग सूत्र से
TEJI AOR MANDI MARCH 7SE 15
TEJI AOR MANDI MARCH 7SE 15
तेजी ओर मंदी 7 मार्च से 15 -2013
सोना चांदी धातु में तेजी ७ता
धातु वस्त् में तेजी 8 ता.
तिल गुड़ गेहू में मंदी 9 ता.
तिल सरसों तेल में मंदी 10 ता.
धातु में मंदी तेल तेजी 11 ता.
रुईखांड गेहू में मंदी 12 ता.
चना मुग चांदी में मंदी 13ता.
अनाज सोना चांदी में मंदी 14 ता.
चांदी रुईमें मंदी 15 ता.
muktajyotishs@gmail.com
तेजी ओर मंदी 7 मार्च से 15 -2013
सोना चांदी धातु में तेजी ७ता
धातु वस्त् में तेजी 8 ता.
तिल गुड़ गेहू में मंदी 9 ता.
तिल सरसों तेल में मंदी 10 ता.
धातु में मंदी तेल तेजी 11 ता.
रुईखांड गेहू में मंदी 12 ता.
चना मुग चांदी में मंदी 13ता.
अनाज सोना चांदी में मंदी 14 ता.
चांदी रुईमें मंदी 15 ता.
muktajyotishs@gmail.com
dunia ke tap ya dukhyo se mukti karane vale sirf ye tine log
dunia ke tap ya dukhyo se mukti karane vale sirf ye tine log
दुनिया के ताप या
दुखों से मुक्ति कराने वाले सिर्फ ये तीन लोग
दुनिया के ताप या दुखों से मुक्ति कराने वाले सिर्फ ये तीन लोग
जीवन के दो पहलु हैं सुख और दुख। या तो कोई व्यक्ति सुखी हो सकता है या दुखी। हमारा पूरा जीवन इन्हीं दो अवस्थाओं के बीच ही चलता रहता है। यदि कोई व्यक्ति दुखी है तो उन्हें किन लोगों से सुख प्राप्त हो सकता है, इसका उत्तर दिया आचार्य चाणक्य ने-
इस जीवन की चाहे जैसी भी परेशानी हो या दुख हो उसका हल निकाला जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी समस्या में उलझा हुआ है तो उसकी पत्नी उसे सही रास्ता दिखा सकती है या उसका इंसान पुत्र कुछ मदद कर सकता है। इनसे भी बात न बने तो उस व्यक्ति के आसपास रहने वाले उसके शुभ चिंतक कोई मदद कर सकते हैं। ये तीन लोग हर समस्या का समाधान कर सकते हैं और व्यक्ति को सुख प्रदान करते हैं। किसी व्यक्ति की पत्नी यदि समझदार, गुणी और विनम्र स्वभाव से है तो उसे हर कदम मजबूत सहयोग प्राप्त होगा। साथ ही अच्छे मित्र और शुभ चिंतक रिश्तेदार भी बुरा समय दूर करने में सहायक हो सकते हैं।
दुनिया के ताप या
दुखों से मुक्ति कराने वाले सिर्फ ये तीन लोग
दुनिया के ताप या दुखों से मुक्ति कराने वाले सिर्फ ये तीन लोग
जीवन के दो पहलु हैं सुख और दुख। या तो कोई व्यक्ति सुखी हो सकता है या दुखी। हमारा पूरा जीवन इन्हीं दो अवस्थाओं के बीच ही चलता रहता है। यदि कोई व्यक्ति दुखी है तो उन्हें किन लोगों से सुख प्राप्त हो सकता है, इसका उत्तर दिया आचार्य चाणक्य ने-
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि...
संसार तापदग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतव:।
अपत्यं च कलत्रं च सतां संगतिरेव च।।
आचार्य कहते हैं संसार या इस दुनिया के ताप या दुखों से मुक्ति कराने वाले सिर्फ ये तीन लोग हो सकते हैं। ये तीन लोग हैं- पुत्र, आसपास के सज्जन लोग और पत्नी।
इस जीवन की चाहे जैसी भी परेशानी हो या दुख हो उसका हल निकाला जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी समस्या में उलझा हुआ है तो उसकी पत्नी उसे सही रास्ता दिखा सकती है या उसका इंसान पुत्र कुछ मदद कर सकता है। इनसे भी बात न बने तो उस व्यक्ति के आसपास रहने वाले उसके शुभ चिंतक कोई मदद कर सकते हैं। ये तीन लोग हर समस्या का समाधान कर सकते हैं और व्यक्ति को सुख प्रदान करते हैं। किसी व्यक्ति की पत्नी यदि समझदार, गुणी और विनम्र स्वभाव से है तो उसे हर कदम मजबूत सहयोग प्राप्त होगा। साथ ही अच्छे मित्र और शुभ चिंतक रिश्तेदार भी बुरा समय दूर करने में सहायक हो सकते हैं।
Tuesday, 5 March 2013
JOKES
है दम, तो 1 मिनट में कीजिए यहां दिमाग का टेस्ट
यूं तो आपने कई सारी पहेलियों को मिनटों में हल किया होगा पर क्या आज भी आपका दिमाग उसी रफ्तार से चलता है। आपकी इस रफ्तार को चेक करने के लिए हम लाए हैं एक पहेली।
अगर आपको लगता है कि आप में है दम। आप कर सकते हैं हर मुश्किल चुटकियों में खतम। तो दीजिए 1 मिनट में दिमाग का ये टेस्ट और साबित कर दीजिए अपना दमखम-
1+4=10
2+8=20
4+16=40
8+32=?
बताएं इस आखिरी लाइन का क्या होगा जवाब ?
तो ये है देश की सबसे बड़ी समस्या।
देश की 4 मुख्य समस्याएं-
1- गरीबी
2- बेरोजगारी
3- भ्रष्टाचार
और
.
.
4- “आज कल के नौजवानों को हर हफ्ते होने वाला सच्चा प्यार!!”
जब कुक्कुर से हुई जेम्स बॉंन्ड की मुलाकात, पलट गया पासा!!!
एक दिन जेम्स बॉंन्ड जंगल में गया वहां उसे एक कुत्ता मिला।
कुत्ते को देखकर वो बोला, “I AM बॉंड..... जेम्स बॉंन्ड”
कुत्ते ने लपक कर उसे काट लिया और बोला.... “मैं हूं कुक्कुर... पगला कुक्कुर!!”
क्लास में बात करना मेरी मजबूरी है मैडम?
टीचर- “नालायक, क्लास में दिन भर लड़कियों के साथ इतनी बातें क्यों करता है?”
लड़का- “मैडम मैं गरीब हूं, मेरे मैसेज फ्री नहीं हैं!!!”
3 महीने नहीं 9 महीने में हुआ बच्चा
संता की शादी के 3 महीने बाद ही बेटा हो गया-
संता- “ये 3 महीने में बच्चा कैसे हो गया”
बीवी- “आपकी शादी को कितना टाइम हुआ है?”
संता- “3 महीने”
बीवी- “और मेरी शादी को?”
संता- “3 महीने”
बीवी- “और बच्चा कितने महीने बाद हुआ?”
संता- “3 महीने”
बीवी- “कुल मिलाकर कितने महीने हो गए?”
संता- “ओ तेरी, वाकई 9 महीने हो गए!
टाइम का पता ही नहीं चला।”
SAPNE KAE PHAL
SAPNE KAE PHAL
अच्छे व बुरे फल देने वाले इन सपनों का सच
स्वप्न ज्योतिष के विद्वानों के अनुसार सपने दो प्रकार के होते हैं एक इष्ट(अच्छे) फल देने वाला तथा दूसरा दुष्ट(बुरे) फल देने वाला।
1- नदी या समुद्र में तैरना, आकाश में उडऩा, सूर्योदय, प्रज्वलित आग, सूर्य आदि देखना, महल, मंदिर, शिखर चढऩे का सपना देंखे तो हर कार्य सफल व सिद्ध होता है।
2- स्वप्न में शराब पीना, मांस खाना, कीड़े खाना, शरीर पर विष्ठा(मल) लगाना, शरीर पर रक्त लगाना व दही-भात खाना शुभ व लाभदायक होता है।
3- यदि सपने में गंदे नाले में स्वयं को गिरते हुए देखें तो बीमारी होती है और एक महीने के भीतर ही किसी बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ता है।
4- सपने में श्वेत चंदन लगाना, अलंकार पहनना अथवा पहने हुए देखना, यह सब देखने वाले जातक को शुभ समाचार मिलता है।
5- सूर्य या चंद्र को सपने में निस्तेज देखना, ध्रुव या अन्य तारों को गिरते हुए देखने पर मनुष्य मरण अथवा शोक को प्राप्त होता है।
6- स्वप्न में यदि स्वयं को नाव में बैठकर नदी पार करते देखते हैं तो दूर की यात्रा का योग बनता है।
7- जो व्यक्ति स्वप्न में गेंहू का ढेर देखता है तो उसे अचानक धन लाभ होता है। सपने में यदि दांत गिरते हुए देंखे तो आयु बढ़ती है
8- यदि स्वप्न में सर्प दिखे तो अनिष्ट होने की संभावना रहती है तथा वंश वृद्धि में भी परेशानी आती है। सपने में खुद को थूकते हुए देंखे तो अनिष्ट फल मिलता है।
9- स्वप्न में घर का दरवाजा गिरते हुए देखें तो कुल का नाश हो जाता है। स्वयं को स्वप्न में पर्वत पर चढ़ते हुए देंखे तो उच्चपद की प्राप्ति होती है।
10-सर्प दिखे तो कभी -कभी गुप्त धन कि प्राप्ति होती है।
JYOTISH SHASTRA
HANUMAN JI KE CHAMATKRI
HANUMAN JI KE CHAMATKRI
होगा धन लाभ
बाधा होगी दूर
नजर बाधा होगी दूर
तंत्र से रक्षा
मनोकामना होगी पूरी
हनुमानजी भक्तों कीपूरी करतेहर मनोकामना
हनुमानजी को कलयुग का जीवंत देवता माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार हनुमानजी एकमात्र ऐसे देवता हैं जो सशरीर इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों कीपूरी करतेहर मनोकामना हैं। मंगलवार के दिन यदि कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो इनका विशेष फल प्राप्त होता है
1->- मंगलवार के दिन सुबह बड़ (बरगद) के पेड़ से 11 साबूत पत्ते तोड़ें और इनको गंगाजल से शुद्ध कर लें। अब इन पत्तों पर केसर से श्रीराम लिखें। इन पत्तों की एक माला बनाएं और हनुमानजी को अर्पित करें। ऐसा करने से धन लाभ होता है।
2->- यदि बच्चों को बार-बार नजर लगती हो या परिवार में किसी को ऊपरी बाधा हो तो मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में जाकर गुड़-चने का भोग लगाएं और हनुमानजी की मूर्ति के दाहिने पैर से थोड़ा सिंदूर लेकर पीडि़त व्यक्ति के सिर पर लगा दें। आपकी समस्या दूर हो जाएगी।
3->यदि आपके घर या परिवार के किसी सदस्य पर किसी ने तंत्र क्रिया की है तो आप घर में पंचमुखी हनुमानजी की प्रतिमा स्थापित करें और प्रतिदिन इनकी विधि-विधान से पूजा करें। इसके प्रभाव से आपको राहत महसूस होगी।
4->- हनुमान यंत्र घर में रखने से सभी प्रकार के वास्तु दोष अपने आप ही दूर हो जाते हैं लेकिन इसकी स्थापना व पूजन विधि-विधान पूर्वक होना चाहिए।
5->- प्रतिदिन किसी हनुमान मंदिर में बैठकर हनुमानचालीसा का पाठ करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी हो जाती है।
BY
MUKTAJYOTISHS@GMAIL.COM
हनुमानजी के चमत्कार, करिए ये 5 काम
होगा धन लाभ
बाधा होगी दूर
नजर बाधा होगी दूर
तंत्र से रक्षा
मनोकामना होगी पूरी
हनुमानजी भक्तों कीपूरी करतेहर मनोकामना
हनुमानजी को कलयुग का जीवंत देवता माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार हनुमानजी एकमात्र ऐसे देवता हैं जो सशरीर इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों कीपूरी करतेहर मनोकामना हैं। मंगलवार के दिन यदि कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो इनका विशेष फल प्राप्त होता है
1->- मंगलवार के दिन सुबह बड़ (बरगद) के पेड़ से 11 साबूत पत्ते तोड़ें और इनको गंगाजल से शुद्ध कर लें। अब इन पत्तों पर केसर से श्रीराम लिखें। इन पत्तों की एक माला बनाएं और हनुमानजी को अर्पित करें। ऐसा करने से धन लाभ होता है।
2->- यदि बच्चों को बार-बार नजर लगती हो या परिवार में किसी को ऊपरी बाधा हो तो मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में जाकर गुड़-चने का भोग लगाएं और हनुमानजी की मूर्ति के दाहिने पैर से थोड़ा सिंदूर लेकर पीडि़त व्यक्ति के सिर पर लगा दें। आपकी समस्या दूर हो जाएगी।
3->यदि आपके घर या परिवार के किसी सदस्य पर किसी ने तंत्र क्रिया की है तो आप घर में पंचमुखी हनुमानजी की प्रतिमा स्थापित करें और प्रतिदिन इनकी विधि-विधान से पूजा करें। इसके प्रभाव से आपको राहत महसूस होगी।
4->- हनुमान यंत्र घर में रखने से सभी प्रकार के वास्तु दोष अपने आप ही दूर हो जाते हैं लेकिन इसकी स्थापना व पूजन विधि-विधान पूर्वक होना चाहिए।
BY
MUKTAJYOTISHS@GMAIL.COM
Subscribe to:
Comments (Atom)
.jpg)
.jpg)